यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।”
जब जब भी धरती पर धर्म की हानि आवश्यकता से अधिक होती है निर्दोष लोगों पर अत्याचार होने लगते हैं । हिंसक घटना क्रम होने लगते हैं, अपराधी तत्वों की बढ़ोतरी होने लगती है, मनुष्य में पाप बढ़ने लगता है, तब तब भगवान राक्षसों व आततायियों का संहार करने के लिए धरती पर अवतरित होते हैं ।
भक्तों की रक्षा हेतु, उन्हें सन्मार्ग पर लाने हेतु ,धर्म संकट से उबारने हेतु, भगवान धरती पर अवतरित होते हैं।
बगडावत द्वारा धर्म का पालन करने पर भी राण के राजा दुर्जन साल द्वारा निर्दोष जनता पर अत्याचार किए गए और नरसंहार किया गया । उनकी त्राहि-त्राहि सुनकर भगवान विष्णु देवनारायण के रूप में धरती पर अवतरित हुए।
विष्णु अवतारी भगवान देवनारायण ने मानव जीवन के धर्म की रक्षा की, अपने वंश की रक्षा की तथा अपने कुल पुरुषों के खोए हुए गौरव को उन्हें पुनः लौटाया।
ग्यारह कला अवतारी भगवान देवनारायण तेजस्वी, शक्तिशाली ,शूरवीर साहसी, क्रांतिकारी थे। अलौकिक कार्यों से युक्त, असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे। जनता के पालक पोषक और रक्षक थे। छोटी उम्र में ही अत्यधिक बुद्धिमान और नीति निपुण थे। दुष्ट को दंड अवश्य देते थे पर हिंसा और खून खराबे से नहीं । उनका दंड देने का तरीका अहिंसा युक्त था। उनका यशस्वी जीवन अद्भुत कौशल और कार्यों का संगम है।
भगवान देवनारायण के जीवन से हमें बहुत सी विशेषताएं और शिक्षाए मिलती हैं । जिन्हें हम जीवन में अनुकरणीय बनाकर अपने मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकते हैं। भगवान देवनारायण गरीब कृषक गुर्जर जाति में उत्पन्न हुए थे। साधारण किसान के रूप में जीवन यापन करते हुए गायों का पालन पोषण किया था। गायों की प्रति प्रेम और निष्ठा अनुकरणीय है । गाय का दूध सुपाच्य और पोषण युक्त होता है। उन्होंने गाय के दूध का महत्व बतलाया। पूजा के लिए गाय का कच्चा दूध ही चढ़ाया जाता है । गाय की महता बढ़ाई। देवनारायण की पूजा स्थल के लिए गाय के गोबर से लीपकर ही पूजा चौकी का निर्माण किया जाता है। लोगों की शारीरिक और मानसिक व्याधियों को रोकने के लिए आयुर्वेद पर बल दिया। अनेक बीमारियों का आयुर्वेद के माध्यम से इलाज किया। नीम वृक्ष को नारायण के रूप में पूजवाया। नीम की पत्तियों को प्रसाद के रूप में काम मे लेने पर बल दिया। स्वयं की मूर्ति के स्थान पर मिट्टी की बनी ईंटों की पूजा करने पर बल दिया । इसलिए इन्हें ईंटों का श्याम कहा जाता है। मिट्टी से बने कच्चे घर और केलु का प्रयोग करने पर बल दिया । जिससे वातावरण शुद्ध रहे। व्यक्ति स्वस्थ और निरोग रह कर जीवन यापन कर सकें। वर्तमान जीवन में कोरोना और लम्बी जैसी महामारी को देखते हुए हमें भगवान देवनारायण के जीवन से बहुत सी अनुकरणीय शिक्षाएं ग्रहण करनी चाहिए। प्रकृति प्रेम भगवान देवनारायण वृक्षों की पूजा करते थे जाल,नीम,इत्यादि वृक्षों की रक्षा की। यह वृक्ष पर्यावरण संरक्षण का कार्य करते हैं और वातावरण को शुद्ध बनाए रखने में मदद करते हैं ।
भगवान देवनारायण ने वनों की रक्षा की और उनके पूजा स्थल आज भी बन्नी के नाम से जाने जाते हैं जहां पर वृक्षों को काटना अपराध माना जाता है।
