किसानों के मसीहा: विजय सिंह पथिक

 


डाॅ.अरुणा गुर्जर 

व्याख्याता, भीलवाड़ा


यश वैभव सुख की चाह नहीं, परवाह नहीं, जीवन न रहें, यदि इच्छा है, तो यह है जग में स्वेच्छाचार दमन ना रहे- विजय सिंह पथिक 



और लोग सिर्फ बातें करते हैं परंतु पथिक सिपाही की तरह काम करता है- महात्मा गांधी


 रोबिला चेहरा, चौड़ी छाती, लंबा बदन, मुख पर ओज, निडर व निर्भीक व्यक्तित्व के धनी, किसानों के मसीहा, सहज व सरल भाषा के धनी, क्रांतिकारी व्यक्तित्व के धनी,राजस्थान केसरी विजय सिंह पथिक भारतीय स्वतंत्रता के प्रमुख सेनानी रहें। 

भारत कई सदियों तक विदेशी आक्रांताओं की जंजीरों में कैद रहा। इस धरा पर ऐसे अनेक वीर स्वतंत्रता सैनानी हुए जिन्होंने भारत की भूमि को आजाद करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया। अपना सर्वस्व लुटा दिया। 

राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक नायाब हीरा विजय सिंह पथिक उर्फ भूप सिंह। अपने नाम के अनुसार ही योद्धा साबित हुए। पथिक अर्थात राही। वास्तव में स्वतंत्रता आंदोलन की सेनानियों में अग्रणी राही रहे । इन्हें राष्ट्रीय पथिक के नाम से भी जाना जाता है। पथिक जी का जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के गांव गुढ़ावली में 28 फरवरी 1882 को गुर्जर परिवार में हुआ । इनका पूरा परिवार क्रांतिकारी था।  दादा इंदर सिंह गुर्जर बुलंदशहर की मालगढ़ रियासत के प्रधानमंत्री थे। पिता हमीर सिंह गुर्जर क्रांतिकारी थे। माता कमल कुमारी देशभक्त थी।

 एक बार इनके पिता बीमार थे तथा अंग्रेज उन्हें गिरफ्तार करने आए पिता के बीमार होने से वह लड़ नहीं सकते थे । कमल कुमारी को जब इस बात का पता चला कि अंग्रेज उनके घर पर धावा बोलने वाले हैं तो कमल कुमारी ने डंडा उठा लिया। अंग्रेजों से पंगा लेने के लिए अकेले घर के बाहर खड़ी हो गई। उन्हें खुली चुनौती दे दी। कमल कुमारी की वीरता से अंग्रेजों के छक्के छूट गए। सभी को वहां से भागना पड़ा। मां की वीरता, साहस और निर्भीकता पथिक जी के खून में आई। पथिक जी में पारिवारिक परिवेश से ही देशभक्ति और क्रांतिकारी भावना पल्लवित होने लगी।

बड़े होने पर रास बिहारी बोस और सचीन्द्र सांन्याल जैसे महान क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। 1911 में जब भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली लाई गई तब लॉर्ड हार्डिंग ने एक विशाल रैली निकाली। इस रैली में बम फेंकने का कार्य कुछ क्रान्तिकारियों को सौंपा गया। जिनमें पथिक जी भी शामिल थे।  होर्डिंग बच गया उसका महावत मारा गया। सभी क्रांतिकारियों को पकड़ने का ऐलान हुआ।  क्रांतिकारी वहां से फरार हो गए तथा अंग्रेजों के हाथ नहीं आए।  रास बिहारी बोस के नेतृत्व में क्रांतिकारियों द्वारा 1857 की क्रांति की तर्ज पर 21 फरवरी 1915 को गदर आंदोलन किए जाने की योजना बनाई गई। राजस्थान में इसका दायित्व विजय सिंह पथिक को दिया गया। इसे प्रथम लाहौर षड्यंत्र के रूप मे जाना गया। इसकी भनक अंग्रेजो को लग गई। फिर फिरोजपुर षड्यंत्र केस से फरार पथिक जी राजस्थान में गोपाल सिंह खरवा के वहां रह रहे थे  दोनों ने मिलकर 2000 युवक 30000 बंदूक एकत्र कर ली थी। दुर्भाग्य से अंग्रेजों को इसका पता लग गया। अंग्रेज कमिश्नर ने गिरफ्तार करने का ऐलान कर दिया।

पथिक जी अपनी पहचान छिपाकर बिजोलिया आ गए। बिजोलिया उस समय ऊपरमाल के नाम से जाना जाता था। 1916 में बिजोलिया के सामंत कृष्णदास ने कई अत्याचारी कदम उठाये। उसने चंवरी कर लगाया जिसमें लड़की की शादी होने पर ₹5 जागीरदार को जमा करने होते थे। इस अतिरिक्त कर से परेशान होकर कई किसानों ने अपनी पुत्री की शादी को स्थगित कर दिया था। साधु सीताराम के नेतृत्व में किसानों ने चंवरी कर को मुक्त करने की कोशिश पर की पर सामंत टस से मस न हुआ। पृथ्वीराज सामन्त ने उत्तराधिकारी कर लगा दिया। पथिक जी को यहाँ के किसानों पर लगाये गए 84 प्रकार के करों के बारे मे पता चला। तब साधु सीताराम के साथ किसान आंदोलन के नेतृत्व करने का बीड़ा उठाया। पथिक जी ने सभी जनता को अपने अधिकारों के लिए सचेत किया। प्रेरित होकर किसानों ने विरोध स्वरूप तीन कदम उठाए । पहला- ठिकाने की भूमि पर खेती नहीं करना, दूसरा -ठिकाने को लगान नहीं देना, तीसरा- ठिकाने में सभी कर बंद कर देना ।

यह तीनों प्रयास विजय सिंह पथिक के प्रेरित करने से हुआ था । विजय सिंह पथिक के क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित होकर ऊपर माल की जनता ने सामन्तों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। जिससे सामंत घबरा गया। लगान न मिलने से उसकी अर्थव्यवस्था चरमरा गई। बिजोलिया  किसान आंदोलन असहयोग व पूर्ण अहिंसात्मक आंदोलन था। पथिक जी ने विचारों ने जोश का संचार किया उन्होंने कहा - यदि तुम पढ़े लिखे हो और देश की स्थिति की जानकारी होकर भी इतने निर्बल हो कि कुछ नहीं कर सकते या इतने गौर स्वार्थी हो कि देश हित के लिए कुछ भी त्याग नहीं कर सकते या ऐसे मोहग्रस्त हो की गृहस्थी तुम्हें कर्तव्य पथ से धकेल कर सड़े गले राह में डाल देता है तो यह उचित ही है कि तुम गुलामी की जंजीरों में ही झकड़े अपना जीवन व्यतीत करते रहो, ऐसी अवस्था में वह भूल करते हैं जो तुम्हें देशहित का पवित्र मंत्र सुनाते हैं क्योंकि तुम उनके उत्तराधिकारी नहीं। याद रखो कि यदि तुम इस अवसर पर बेकार बने रहे तो तुम्हारा उद्धार इतनी सरलता से नहीं होगा। इस प्रकार की क्रांतिकारी और जोशीले वचनों से जनता में जोश भर गया। जिसने भी सुना सभी ने एकजुट होकर आंदोलन शुरू कर दिया। जनता के दबाव के कारण सामंत को लगान में छूट देनी पड़ी । 84 में से 35 कर को माफ कर दिया गया । यह एक पूर्ण अहिंसात्मक आंदोलन की पहली सफलता थी। पथिक जी ने किसानों की एकता को बनाए रखने के लिए ऊपर माल पंचायत बोर्ड का गठन किया।  पहले अध्यक्ष सरपंच मन्ना जी पटेल को बनाया गया। उन्होंने जगह-जगह पंचायत बोर्ड बनाएं। जनता को अंग्रेजों के आततायी शासन से बचाया। जनता की समस्या व उनके विचारों से अवगत कराने के लिए कई पत्र-पत्रिकाओं में पत्र लिख लिख कर भेजे। कानपुर से प्रकाशित गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रताप पत्रिका का विशेष योगदान रहा। इस पत्रिका ने किसान आंदोलन को समूचे भारत में चर्चा का विषय बना दिया। वर्धा से राजस्थान केसरी पत्र निकाला। अजमेर में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की। अजमेर से राजस्थान केसरी, नवीन राजस्थान पत्र निकाले। पत्र- पत्रिकाओं के साथ उपन्यास, कहानी संग्रह , निबंध इत्यादि भी लिखे। जिसमें अजय मेरु - उपन्यास, कल्पना कल्लोल -काव्य संग्रह,  पथिक प्रमोद- कहानी संग्रह , पथिक निबंधवाली, पथिक विनोद, पथिक जी के जेल के पत्र इत्यादि क्रांतिकारी लेखनी नें क्रांतिकारी विचारों को साहित्यिक रूप से हमारे समक्ष प्रस्तुत किया। पथिक जी निर्भीक व निडर व्यक्तित्व के थे। उनके मूल्य, आदर्श, एक साहसी नेता के थे। उन्होंनें बेजुबान लोगों की सहायता की, किसानों की स्थिति को समझा और उन्हें उनका हक दिलवाया। पूर्ण स्वतंत्रता से पूर्व निरंकुश शासको से बचते रहे ।पथिक जी के जीवन का अंतिम पड़ाव काफी दुखद रहा, आश्रम में जीवन बिताया । कर्मपथ के योगी पथिक जी लू के शिकार हो गए। रुग्ण अवस्था में ज्वर तथा निमोनिया के कारण उनकी जीवन लीला समाप्त हुई । क्रांतिकारी योद्धा विजय सिंह पथिक 27 मई 1954 को महाप्रयाण कर गया ।  हे महापुरुष, हे युग दृष्टि,  हे युग प्रवर्तक , हे किसान मसीहा, तुझे शत-शत नमन।


सत्यवादी वीर तेजाजी


डॉ. अरुणा गुर्जर, व्याख्याता, भीलवाड़ा




राजस्थान की भूमि वीर प्रसूता है । इसके कण-कण में वीरता, शौर्य की अनुगूंज सुनाई देती है। इस माटी के लाल जन्म से ही मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व होम करने का प्रण लेकर जीवन आरंभ करते हैं। इस वीर प्रसूता की माटी में ऐसे कई महापुरुषों के गुणगान सुने जा सकते है। त्याग, बलिदान, वचन निर्वाह, साहस, अहिंसा, मातृभूमि की रक्षा इत्यादि अकूत गुणों से पूरित ये  महापुरुष जन-जन के कण्ठाहार बन जाते हैं। प्रातः स्मरणीय इन महापुरुषों की गाथाओं का समाहार हमारी संस्कृति और साहित्य में मिलता है। राजस्थानी साहित्य में विभिन्न लोक देवताओं, महापुरुषों, विदुषियों,वीरांगनाओं की गाथाएं मिलती है। इन गाथाओं में शौर्य, वीरता, त्याग, वचनबद्धता, नीति, मर्यादा के साथ देवत्व भाव का सांगोपांग सांस्कृतिक चित्रण मिलता है। तेजाजी, देवनारायण जी, गोगाजी, पाबूजी, रामदेव जी, डूँगजी- जवाहर जी, निहाल दे सुल्तान, ढोला-मारू, भर्तृहरि इत्यादि की वीर गाथाएं प्रसिद्ध है... आईये आज हम लोकदेवता तेजाजी के बारे मे जानते है-

प्राण जाए पर वचन न जाए कहावत तो आपने सुनी होगी। इस कहावत को चरितार्थ करने वाले हमारे प्रिय लोक देवता तेजाजी महाराज जिन्होंने गौ रक्षा और अपने वचनों का पालन करते हुए हंसते-हंसते अपने प्राण त्याग दिए । भगवान शिव के 11 वें अवतार, काला और बाला के देवता, किसानों के रक्षक, गौ-रक्षक, नागों के देवता, तेजाजी का जन्म माघ सुदी चौदस विक्रम संवत 1130 को नागौर जिले के खरनाल गांव में हुआ था। पिता ताहड़ दे, माता राम कुवंरी के गर्भ से धोलिया गोत्र जाट परिवार में हुआ। पिता ताहड़ दे खरनाल (नागौर) के मुखिया थे। माता किशनगढ़ (अजमेर) की निवासी थी। दोनों शिव भक्त थे। ऐसी मान्यता है की माता राम कुंवरी को नाग देवता के आशीर्वाद से पुत्र तेजा की प्राप्ति हुई। जब तेजाजी का जन्म हुआ तो उनके मुख पर अद्भुत तेज था। उन्हें देखकर उनका नाम तेजा रखा गया। कहावत है कि पूत के पाँव पालने मे दिख जाते है। तेजाजी बचपन से ही सत्यवादी, प्रखर और रक्षक बनकर उभरे। राजल दे तेजाजी की प्रिय बहन थी। तेजाजी के तेजस्वी स्वरूप को देखकर पनेर के रायमल जी ने अपनी पुत्री पेमल का विवाह तेजाजी के साथ करने का निश्चय किया। जब तेजाजी का विवाह हुआ तब तेजाजी 9 माह के थे। और पेमल 6 माह की थी। विवाह बुद्ध पूर्णिमा विक्रम संवत 1131 को संपन्न हुआ। पेमल के मामा खाजू काला थे। विवाह के कुछ समय बाद मामा खाजू काला और जो पिता ताहड़ जी मे विवाद हो गया। खाजू काला धोलिया परिवार से दुश्मनी रखते थे। वे इस रिश्ते के पक्ष में भी नहीं थे। खाजू काला जी इतने क्रूर हो गए कि उन्होंने ताहड़ दे पर हमला कर दिया। अपने और अपने परिवार की रक्षा के लिए ताहड़ दे जी को तलवार से खाजू काला को मारना पड़ा। इस अवसर पर तेजाजी के चाचा आस करणजी भी उपस्थित थे। यह घटना सुन पेमल की मां को अच्छा नहीं लगा उसने ताहड़ दे जी और उनके परिवार से बदला लेने की सोची। विवाह के बाद हुई इस अप्रत्याशित घटना से दोनों परिवार स्तब्ध थे। दोनों परिवार ने विवाह को मान्यता नहीं दी। बचपन में विवाह होने की घटना से तेजाजी अनभिज्ञ थे। जब तेजाजी व्यस्क हुए तो उनके पास असंख्य गायें और घोड़े थे। लीलण घोड़ी उनकी प्रिय घोड़ी थी। प्रकृति-प्रेमी तेजा गांव मे गायें चराते। उन्हें प्रकृति और पशुओं के बारे मे, फसल और उनकी किस्मों, पशुओं के वंश,रोग,औषधियों के बारे मे बहुत जानकारी थी। उनके पास कई बीमार पशु आते और स्वस्थ होकर जाते थे। नागौर की भूमि पथरीली और अनूपजाऊ थी। तेजाजी वहाँ अपनी मीठी वाणी से गीत गाते-गाते उस भूमि को हल जोत उपजाऊ बना देते थे। वहाँ कुछ महीनों बाद फसले लहलहा उठती। एक दिन मां ने तेजाजी को अपनी बहन राजल देवी को ससुराल से लाने के लिए कहा। तेजाजी लीलण पर सवार होकर राजल के ससुराल पहुंचे और बहन को अपने साथ घर लिवां लाये। घर आकर जब खाना खाने बैठे तब तक खाना ठंडा हो चुका था।  उन्होंने अपनी भाभी से कहा कि मुझे खाना गर्म करके दे दो। बड़ी भाभी उस समय क्रोध में थी इसलिए उन्होंने कहा की इतना ही गर्म खाना है तो पनेर से अपनी पत्नी पेमल को ले आओ। वही तुम्हें गरम-गरम पुए बनाकर खिला देगी। भाभी की यह बात सुनकर तेजाजी को बड़ा अचरज हुआ। उनको खुद के विवाह की जानकारी नहीं थी। उन्होंने अपनी मां से पत्नी पेमल के बारे में जानना चाहा। उनकी मां ने बचपन में हुए विवाह और खाजू काला की सारी घटना सुना दी । तेजाजी ने कहा कि मैं बचपन में हुए इस विवाह को स्वीकार करता हूं और अभी जाकर अपनी पत्नी को ले आता हूं ।तेजाजी आवेश में आकर माता के लाख मना करने पर भी बिना शगुन देखें अपने ससुराल पनेर की ओर रवाना हो गए। रास्ते में कई अपशगुन हुए लेकिन तेजाजी रुके नहीं। तेजाजी जब अपने ससुराल पहुंचे तो काफी अंधेरा हो गया था। ससुराल में किसी को यह अंदेशा नहीं था की पेमल के पति तेजाजी पधारे हैं। उन्होंने किसी अनजान व्यक्ति को समझ कर और बिना पूछे घर में घुसता हुआ देखकर अपशब्द कहे।तेजाजी वहां से पुनः लौट आए थोड़ा आगे उन्हें लाछा गुजरी मिली जो की पेमल की प्रिय सहेली थी । लाछा गुजरी से उन्होंने पेमल के बारे में पूछना चाहा। लाछा ने उन्हें बताया कि वह पेमल की बहुत अच्छी सहेली है। साथ ही पेमल की सुंदरता और व्यक्तित्व का गुणगान किया। उसने कहा कि आप एक बार पेमल से मिलो। तेजाजी को अपने घर रुकने के लिए बोला और कहां आप मेरे घर चलिए मैं आपकी बहन के समान हूं आप मेरे घर विश्राम कीजिए। पेमल भी आपसे मिलना चाहती है। तेजाजी लाछा गुजरी के घर विश्राम के लिए रुके। उधर लाछा गुजरी की गायों को मेर के मीणाओं ने बंधक बना लिया।  शाम को जब लाछा की गायें घर नहीं लौटी तो लाछा उन्हें ढूंढने निकली। जब उसे पता चला की मेर के मीणाओं ने उसकी गायों को बंधक बना दिया है तो वह रोने लगी। उसे रोता हुआ देखकर तेजाजी ने उनसे बात की। लाछा को वचन दिया की बहन अब मैं तुम्हारी गायें लेकर लौटूंगा तभी तुम्हारे घर का अन्न- जल ग्रहण करूंगा। तेजाजी उसी रात मेर के मीणाओं की ओर बढ़ गए। प्रातः होते ही सीमा में प्रवेश कर गए, तलवारबाजी और भाले के रण कौशल से सभी मीणाओं को धराशायी कर दिया और बंधक गायों को छुड़ा लिया।  सभी गाये लाछा के घर आ गई । एक बछड़ा पीछे छूट गया लाछा ने जब अपने सभी गायों को गिना तब उसने कहा कि मेरा एक अति प्रिय बछड़ा पीछे रह गया है। तेजाजी पुनः उस बछड़े को लेने मीणाओं की सीमा की ओर बढ़ चले। तभी सुरसुरा नामक स्थान पर एक ढेर मे अग्नि को जलते हुए देखा। अग्नि मे एक काला नाग जल रहा था। तेजाजी ने जब उसे जलते हुए देखा तो बचाने के लिए उसके पास पहुंचे। उन्होंने देखा की एक बड़ा सा काला नाग अग्नि में जल रहा है । तेजाजी ने अपने भाले से नाग को अग्नि में जलने से बचाया और बाहर निकाल दिया। इस बात से खफा नाग ने तेजाजी से कहा कि मैं अग्नि में जलकर अपने इस जीवन को नष्ट करके मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयास कर रहा था और तुम मुझे जलते हुए अग्नि से निकलकर मेरी मोक्ष प्राप्ति में बाधक बने हो। अब मैं अधजला हो गया हूं। ना में सही जीवन यापन कर सकता हूं और ना ही मोक्ष प्राप्त कर सका हूं। अतः क्रोधित होकर अब मैं तुम्हें डसूंगा। तेजाजी ने कहा कि मैं मेरी धर्म बहन लाछा के बछड़े को लेने जा रहा हूं जब उसे लेकर वापस लौटूंगा तब आप मुझे डस लेना। वासक नाग ने कहा कि मुझे आपकी बातों में सच्चाई नहीं लगती। तब तेजाजी ने कहा की सूर्य देवता हमारी इस बात के साक्षी हैं कि मैं बछड़े को छुड़ाकर वापस लौट कर सर्वप्रथम आपके पास अवश्य आऊंगा। वासक नाग ने तेजाजी को जाने की अनुमति दे दी। तेजाजी द्रुतगति से बछड़े को ढूंढने निकल पड़े। आगे मेर की सीमा पर सभी सैनिक युद्ध करने के लिए तैयार हो गए थे। तेजाजी को वापस आता देखकर सभी मीणाओं ने अचानक आक्रमण कर दिया। तेजाजी ने डटकर पूरी सेना का अकेले मुकाबला किया। अपनी तलवार और भाले के रण कौशल से हजार- हजार सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। इस युद्ध में स्वयं भी पूरे घायल हो गए । उनके पूरे शरीर से रक्त की धाराएं प्रवाहित होने लगी। उन्हें जब वह बछड़ा मिला तो उन्होंने उस बछड़े को मुक्त कराया और लाछा गुजरी के घर की ओर भेज दिया। तेजाजी युद्ध के बाद पुनः वचनानुसार वासक नाग के पास आए। वासक नाग वही अग्नि के पास तेजाजी का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने तेजाजी को वापस आता देखकर उनकी वचनबद्धता से प्रसन्न होकर उन्हें सत्यवादी की उपाधि दी और कहा कि तुमने अपना कहा वचन निभाया इसलिए जगत में सत्यवादी कहलाओगे। तुम्हारे शरीर पर जगह-जगह घाव है और एक भी स्थान ऐसा नहीं बचा जहां मैं तुम्हें डस सकूं तब तेजाजी ने कहा की हे नाग देवता आप मेरी जिव्हा पर डस लीजिए। यह घाव रहित है। तेजाजी की इस बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर वासक नाग ने वरदान दिया की आप जगत मे अमर रहोगे, तेजाजी नागों के देवता के रूप में पूजे जाएंगे। तेजाजी के थान की मिट्टी, गोबर की भभूत लगाने और राखड़ी बांधने से बड़े से बड़े सांप का जहर समाप्त हो जाएगा। ऐसा वरदान देकर वासक नाग में तेजाजी की जिव्हा पर डंक लगा दिया फिर वासक नाग पुनः अग्नि में कूद पड़े। नाग के जहर के प्रभाव से तेजाजी का पूरा शरीर नीला पड़ गया और वे बेसुध हो गए। उनकी लीलण घोड़ी यह सब दृश्य देख रही थी। तेजाजी को वीरगति प्राप्त करता देख घोड़ी ने तेजाजी को अपने ऊपर बिठाया और खरनाल की ओर  द्रुतगति से रवाना हो गई। प्रिय लीलण घोड़ी बहुत वफादार थी। घोड़ी तेजाजी को अपने पीठ पर ढोती हुई अकेले खरनाल पहुँची। उसकी आँखों में आँसू थे । घर वालो ने जब यह दृश्य देखा तो विलाप करने लगे। पेमल को जब यह सब घटनाक्रम पता चला तो उसने तेजाजी के साथ सती होने का निर्णय किया। भाद्रपद शुक्ल दशमी संवत 1160 को खरनाल में तेजाजी के संग पेमल सती हुई। लीलण घोड़ी ने कई दिनों तक अन्न-जल ग्रहण नहीं किया । वीर, गौ-भक्त, सत्यनिष्ठ, वचनपालक तेजाजी की  घर-घर में पूजा की जाती है। जाट जाति के कुल देवता है। सभी पशुपालक जाति के आराध्य देवता है। इनके पूजा स्थल थान कहलाते है ।प्राचीन 'थान' (चबूतरे) खुले आसमान के नीचे होते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि तेजाजी ने स्वयं कहा था कि वे बंधनों में नहीं, बल्कि स्वतंत्र रहकर भक्तों की पुकार सुनना चाहते हैं। खुली छत के नीचे चबूतरा बनाकर पत्थर पर लीलण पर सवार तेजाजी भाला हाथ मे लिए जीभ पर सर्पदंश को दर्शाती मूर्ति उकेरित होती है। धूप, दीप व घंटियों की आवाज से भोपा(घोड़ला) दोनों समय पूजा करते है। सुरसुरा नामक स्थान पर सर्प के रूप में तेजाजी के दर्शन किए जा सकते है। मूर्तियों में उन्हें हमेशा अपनी जीभ पर सर्पदंश लेते दिखाया जाता है। यह एक प्रतीक है कि शूरवीर तेजाजी शरीर के घावों (जो युद्ध में लगे थे) को अपवित्र मानकर केवल 'जीभ' को ही शुद्ध माना।यह सर्पदंश व वचनबद्धता का प्रतीक है। अजमेर के पास भावंता धाम नामक एक ऐसी जगह है जहाँ सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति को तेजाजी के नाम की तांती बांधी जाती है और वह बिना किसी दवा के ठीक हो जाता है। यहाँ आज भी विज्ञान और आस्था का अद्भुत संगम दिखता है। राजस्थानी में कहावत है— "खेता में तेजो, घर में गेणो" (खेत में तेजाजी का नाम लेना और घर में गहना/आभूषण होना ज़रूरी है)। तेजाजी किसानों के लिए सुरक्षा के सबसे बड़ा आधार हैं। खेती की शुरूआत से पहले तेजाजी के नाम की टेर/ आवाज/ गोठ गाई जाती है। तेजाजी के गीतों में केवल भक्ति नहीं, बल्कि वीर रस की प्रधानता है, जो सुनने वालों में जोश भर देती है। राजस्थान सरकार द्वारा 2018 में तेजाजी के जन्मस्थान खरनाल में एक भव्य वीर तेजाजी पैनोरमा बनाया गया, जहाँ अत्याधुनिक तरीके से उनके जीवन की झांकियां दिखाई गई हैं। नागौर और अजमेर के कई स्थानों पर तेजाजी की याद में छतरियां बनी हुई हैं, जो स्थापत्य कला का सुंदर नमूना हैं। तेजाजी ने पेमल की सहेली लाछा गुर्जरी की गायें बचाई थीं, उन लाछा गुर्जरी की याद में भी रंगबाड़ी (अजमेर) में पूजा होती है। यह भाई-बहन के पवित्र स्नेह और रक्षा का प्रतीक है। अजमेर के पनेर में तेजाजी के साथ उनकी पत्नी पेमल की भी पूजा होती है। यह मंदिर पति-पत्नी के अटूट प्रेम और बलिदान का गवाह है। तेजाजी के थान(स्थान) पर हर जाति और धर्म के लोग आस्था रखते है। यह सांप्रदायिक सौहार्द के बहुत बड़े प्रतीक हैं। केवल सर्पदंश ही नहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में जब किसी पालतू पशु की टांग टूट जाती है या वह बीमार होता है, तो तेजाजी के नाम का धागा (तांती) बांधा जाता है। तेजाजी के थान की भभूत और धूल के लगाने से पशु ठीक होने लगते है। ठीक होने पर भक्त मन्दिर और मेले में प्रसाद चढ़ाते हैं।

                    तेजाजी ने लाछा गुर्जरी की केवल गायें ही नहीं बचाईं, बल्कि उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि गौ-रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करना सबसे बड़ा धर्म है। तेजाजी की मूर्तियों में उनके पास हमेशा एक भाला और ढाल होती है। उनकी घोड़ी लीलण का मुँह अक्सर तेजाजी की ओर मुड़ा हुआ दिखाया जाता है, जो उनकी अटूट वफादारी का संकेत है। तेजाजी के अनुयायी केवल हिंदू ही नहीं हैं, बल्कि कई अन्य समुदायों के लोग भी उन्हें 'वीर पुरुष' और 'रक्षक' के रूप में मानते हैं। उनके मंदिरों में होने वाली आरती और भजन सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करते हैं। तेजाजी का जीवन एक ऐसी अमर गाथा है जो हमें  सत्य, निडरता और ईमानदारी से जीना सिखाती है। तेजाजी महाराज की याद में राजस्थान के कई जिलों में भव्य मेले आयोजित होते हैं, जिनमें परबतसर का पशु मेला सबसे विशाल और ऐतिहासिक है। इसकी शुरुआत मारवाड़ के राजा अजीत सिंह के काल में हुई थी। यहाँ तेजाजी की एक प्राचीन मूर्ति जोधपुर से लाकर स्थापित की गई थी। परबतसर पशु मेला केवल व्यापारिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक, सभ्यता और आस्था का उत्सव है। इस मेले में नागौरी बैलों की प्रदर्शनी व बिक्री दुनिया भर में प्रसिद्ध है।पशु मेले का मुख्य आकर्षण नागौरी बैल और ऊंटों की खरीद-फरोख्त है। भाद्रपद शुक्ल दशमी (तेजा दशमी) से शुरू होकर पूर्णिमा तक। यह राजस्थान के सबसे बड़े मेलों में से एक है । यहाँ राजस्थान की लोक संस्कृति, गैर नृत्य, और तेजाजी के गोठा (गायन) का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।  खरनाल का मेला (नागौर) तेजाजी की जन्मस्थली खरनाल में भी तेजा दशमी पर विशाल मेला भरता है। लाखों श्रद्धालु यहाँ दर्शन करने और धोक लगाने आते हैं। सुरसरा (अजमेर) तेजाजी के निर्वाण स्थल पर श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं और नारियल चढ़ाते हैं। सेंदरिया (अजमेर) जहाँ तेजाजी को नाग ने डसा था, वहाँ भी हर साल मेला लगता है। भावंता (अजमेर) यहाँ सर्पदंश से मुक्ति की कामना के लिए भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। तेजा दशमी के दिन राजस्थान में सरकारी अवकाश भी रहता है और हर गाँव के तेजाजी के थान पर जागरण और मेले का आयोजन होता है। ऐसे महान कृषि कार्य के उपकारक देवता तेजाजी महाराज को हम बारम्बार प्रणाम करते है। 

भगवान श्री देवनारायण की गाथा एवं देव धाम

 इस पुस्तक मे भगवान श्री देवनारायण की गाथा और बगड़ावत लोक गाथा का अध्ययन किया गया है। यह गाथा नवीं-दसवीं शताब्दी के तात्कालिक समय को दर्शाती है। गुर्जर संस्कृति और भगवान श्री देवनारायण की विभिन्न लीला तथा उनके जीवन का चित्रण सरल हिन्दी भाषा में किया गया है। श्री देवनारायण और बगड़ावतो के ऐतिहासिक स्थानों, मंदिरों के बारे में विस्तृत जानकारी समाहित की गई है। बगड़ावत लोकगाथा को विभिन्न आयामों से व्याख्यायित करने का कार्य किया है। उनकी जीवन गाथा को प्रस्ततु किया गया है। यह श्री देवनारायण के जीवन-चरित्र, मूल्य और पावन कृतियों का एक अशं है। प्रमाणिकता के साथ विभिन्न तथ्यों को प्रस्तुत किया गया है। 

 इस पुस्तक का मूल्य 370 डाक खर्च सहित है। 

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*शौर्य और पराक्रम के धनी बाघराव जी*

 *शौर्य और पराक्रम के धनी बाघराव जी* 

राजस्थान की वीर समरांगण मरुभूमि पर अनेक अवतार हुए। जनमानस की मौखिक गाथाएँ जन-जन के कंठों का हार है। बगड़ावत गाथा हमें संवाद रूप में और गीतों के रूप में मिलती है। यह गेय शैली में है। बगड़ावत गाथा का प्रमुख क्षेत्र मेवाड़ और मालवा रहा है। इस गाथा ने मेवाड़ और मालवा को एकाकार कर दिया है। प्राचीन समय में आध, आध के पुत्र जुगाध, जुगाध के पुत्र काजल, काजल के पुत्र मांडल, मांडल के पुत्र हरिसिंह, हरिसिंह के पुत्र बाघराव, बाघराव के चौबीस पुत्र बगड़ावत कहलाए। चौबीस में श्री सवाईभोज के पुत्र देवनारायण हुए।


बगड़ावत इतिहास अमिट और स्वर्णिम पन्नों पर अंकित हैं। धर्म,आदर्श, सच्चाई की राह पर चलने वाला यह गुर्जर समाज पूरे भारतवर्ष में फैला हुआ हैं। सद्गति का पालन करने वाले और निश्चल भाव के समाज में भगवान श्री देवनारायण का जन्म हुआ। सामाजिक समरसता के धनी भगवान श्री देवनारायण ने सभी धर्म के गरीब और असहाय वर्ग को ऊपर उठाया। भगवान श्री देवनारायण गुर्जर समाज की कुल देवता हैं अन्य सभी समाज अपने आराध्य देव के रूप में पूजा करते हैं। न केवल गुर्जर समाज अपितु सभी समाजों के लोग भगवान श्री देवनारायण की शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाते हुए प्रमाण स्वरूप ताम्बे की गोल धारण करते हैं।

जब जब धर्म और मान की हानि होती है तब तब ईश्वर मानव रूप में अवतार लेकर सभी दुष्टों का संहार करते है। भगवान श्री देवनारायण ने श्री सवाई भोज और माता साडु के पुत्र रूप में जन्म लिया। अपने पूर्वजों के साथ हुए अन्याय का बदला बुद्धिमानी से लिया।


 9वीं शताब्दी में अजमेर, साभंर में चौहान वंश का साम्राज्य था। बीसलदेव द्वितीय राजा थे। इस समय मेवाड़ धरा पर सामन्त नियुक्त थे। मांडल रियासत में हरिसिंह गुर्जर सामंत रूप में राज करते थे।

नाग पहाड़ पर एक खूंखार सिंह का आतंक था। वह प्रतिदिन कई जानवरों और मनुष्य का शिकार करता था। शेर के आतंक से परेशान होकर जनता ने राजा ने दरबार में गुहार लगाई। बीसलदेव राजा ने ऐलान किया कि जो इस खूंखार सिंह को मार कर लायेगा उसे मुँह मांगा इनाम दिया जाएगा। कई व्यक्तियों ने प्रयास किया परंतु खूंखार सिंह का कुछ नहीं बिगाड़ सकें। जनता ने मिलकर सिंह के पास प्रतिदिन एक पशु और एक व्यक्ति को भिजवाने का नियम बनाया। उस क्षेत्र के प्रत्येक घर से प्रतिदिन एक व्यक्ति एक पशु को लेकर शेर का शिकार बनने जंगल में जाते थे। शेर का पेट भर जाता और वह दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाता था। उन्हीं दिनों मांडल के सामंत हरिसिंह गुर्जर एक कुम्हार के यहाँ रात्रि विश्राम हेतु रुके। उस घर में बुढ़िया और उसका बेटा रहता था। प्रातः काल सिंह का शिकार भेजने की बारी इन्हीं की थी। आपसी बातचीत चल रही थी की कौन शेर का शिकार बनने जाएगा ? यह वार्ता हरिसिंह ने सुनी। हरिसिंह ने कहा कि आप चिंता न कीजिए मैं भी आपके पुत्र के समान हूँ। कल मैं ही सिंह का शिकार बनने जाऊँगा। बुढ़िया के मना करने पर भी हरिसिंह नहीं माने और उन्हें वचनों में लेकर खुद शेर के पास चले गए। अपने साथ लाई बकरी को एक झाड़ के पास बांध दिया। तलवार लेकर सिंह के आने का इंतजार करने लगे। एक पहर बीतने के बाद शेर उस स्थान पर आया। हरिसिंह ने फुर्ती से तलवार की धार से एक ही वार में शेर की गर्दन धड़ से अलग कर दी। एक हाथ में रक्त रंजित तलवार और दूसरे हाथ में शेर के मुँह को लेकर अजमेर दरबार की ओर प्रस्थान किया। अजमेर के पास आते समय मार्ग में एक बावड़ी दिखी। उन्हें प्यास लगी थी।

प्यास बुझाने के लिए बावड़ी की ओर बढ़े। उस बावड़ी में एक साध्वी लीला सतवन्ती तपस्या करती थी । वह प्रातःकाल ब्रहमूर्हुत में शिव की आराधना करती थी। उसका नियम था की वह पूजा पाठ में किसी पुरुष का मुख नहीं देखती थी।

 इस से अनजान हरिसिंह बावड़ी की ओर बढ़ चले। तलवार को एक तरफ रख ली। एक हाथ से सिंह मुख ऊंचा रख पानी पीने लगे। पानी के हिलने की आवाज से लीला सेवंती (सतवन्ती) का ध्यान भंग हुआ। उसने पानी की परछाई में एक सिंह का मुख और मनुष्य शरीर दिखाई दे गया। वह भयभीत हो गई कि कोई वनमानुष बावड़ी में जल पीने आया है। तभी हरीसिंह को वहाँ लीला सेवंती (सतवन्ती) की तपस्या भंग होने का भान हुआ। उन्होंने माफी मांगी, प्यास बुझाने हेतु इस ओर आने का प्रयोजन बताया। लीला (सतवन्ती) हरिसिंह की सच्चाई, वीरता,शौर्यता तथा सौंदर्य को देखकर मोहित हुई । उन्होंने संपूर्ण बात जानकर अपने आप को हरिसिंह को समर्पित करने का सोचा। लीला (सतवन्ती) में कहा कि आप बीसलदेव राजा के पास यह सिंह लेकर जाएंगे तो वह आपको वरदान मांगने के लिए कहेंगे तब आप विवाह हेतु मेरा हाथ राजा से मांग लेना।

इस प्रकार हरिसिंह और लीला (सतवन्ती) सेवंती का विवाह संपन्न हुआ । कुछ समय पश्चात उनके घर एक पुत्र को जन्म हुआ। जो अद्भुत था। सिंह का मुख और मनुष्य जैसा शरीर। तेज और ओज से युक्त ललाट था। लीला सेवंती इस बालक को देखकर डर गई। दासी को कहकर उसे जंगल में छोड़ने के लिए तैयार हो गई। मांडल के पास रूई मे लपेटकर जंगल में छोड़ दिया (इन्हीं की याद स्वरूप आज भी माण्डल मे नाहर नृत्य होता है।) एक कहावत है कि जाको राखे साइयां, मार सके ना कोई। उस बालक को रोता देखकर एक शेरनी पास आई और उसने अपना दूध पिलाया। बालक को जीवित रखा। कुछ दिनों बाद वहाँ से राहगीरों का एक दल गुजरा। राहगीरों ने रोते हुए इस अद्भुत बालक को देखा। उस अद्भुत बालक को अजमेर दरबार मे राजा तक पहुँचा दिया।

राजा बीसलदेव ने इस पुत्र के देखरेख की जिम्मेदारी हरिसिंह को दी। कहाँ की तुम इसका पालन पोषण करो । यह वीर बालक है और इसके तेज तथा ओजस्वी मुख को देखकर यह आभास होता है कि यह बालक इतिहास में अपनी अमिट पहचान बनाएगा। राजा का आदेश मान हरिसिंह और हरि इच्छा मान बालक को अपने घर ले आये। लीला सेवंती भी अपने पुत्र को पुनः अपने पास प्रकार बहुत खुश हुई। उसे अपने किए पर पछतावा हो रहा था। लेकिन पुत्र को पुनः प्रकार प्रफुल्लित हो गई। इस प्रकार यह बालक बड़ा हुआ।

अपनी ओजस्वी छवि, वीरता, शौर्य, पराक्रम के कारण बाघराव अपने क्षेत्र में काफी चर्चा में रहे। उन्हें देखकर सब डरते थे लेकिन उनके दयालु और दानवीर व्यवहार से सब प्रभावित होते। पुष्कर के पास उपवन की देखभाल की जिम्मेदारी उनकी थी। एक चतरा ब्राह्मण और बाघराव दोनों मिलकर बगीचे का भ्रमण करते। श्रावण के माह में कुछ कन्याएं वहाँ झूला झूलने आती थी । बाघराव जी उन्हें झूला झुलाते। भूलवश गोल गोल झूलते हुए भांवरे खा लिए। वयःअवस्था में जब उन कन्याओं के विवाह हेतु सावा निकाले तो नहीं निकले। तब उनसे पूछा गया तो उन्होंने बताया कि खेल खेल में हमने भांवरे ली। परिजन सभी कन्याओं को लेकर बाघजी के पास पहुंचें उन्होंने भी अपनी भूल स्वीकार की तथा बारह गुर्जर कन्याओं के साथ उनका विवाह हो गया। एक कन्या चतरा ब्राह्मण के साथ ब्याही उनकी संतान गरूड़िया ब्राह्मण कहलाई। बारह ही रानियों को लेकर बाघरावजी बदनोर रियासत में रहने लगे। उन्होंने बारह ही रानियों के नाम से तालाब और बावड़ियाँ बनाई।

डाॅ.अरुणा गुर्जर 

व्याख्याता

दहेज

 दहेज : एक सामाजिक भीख


आदरणीय महानुभावों आज मैं एक बहुत ही संवेदनशील विषय पर बात कर रही हुँ यह विषय अत्यंत ज्वलंत होने के साथ-साथ घर घर की कहानी है ........शादियों का दौर आ चुका है और कहीं जीमते हुए तो कहीं राह चलते हुए एक गाना सुनाई दे जाता है.....बाबुल की दुवाएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले....यहाँ एक पिता अपनी बेटी को अपने घर से विदा कर पति को सौंप रहा हैं और उसे खुशी, आशीर्वाद के साथ विदा करते हुए वह परमपिता परमात्म ईश्वर से अरदास कर रहे है कि उसकी बेटी का नव दांपत्य जीवन खुशहाल बना रहें। जिस प्रकार उसने हंसते खिलखिलाते हुए पिता के आंगन में अपना अब तक जीवन बिताया है उसी प्रकार आगे का जीवन भी खुशहाल बना रहे। यहाँ संसार मतलब शादी-शुदा जीवन। पर यहाँ प्रश्न यह है कि क्या बेटी जब ससुराल के लिए विदा होती है तो क्या केवल दुआयें ही साथ ले जाती है तो जवाब होगा नहीं। उसे साथ ले जाना होता है कीमती वस्त्र, आभूषण, पैसा, गृहस्थी का सामान, गाड़ी और बंगला। वह खुद एक परिवार को छोड़कर दुसरे परिवार मे जाती है। उसे सभी अपरिचित लोगों को अपना परिवार मानना है। अपनी पहचान को समाप्त कर वह अपने पति की पहचान से जानी जायेगी। विवाह के साथ उसका पूरा जीवन बदलता है। इतना सब करते हुए भी क्या ससुराल में वह खुश रह पाती है...???

क्या लोगों की लालसाएँ नहीं बढ़ती ....पैसा मिला है तो पीछे कितने जीरो लगे है... आभूषण मिले है तो कितनी मात्रा में है.... गृहस्थी का सामान मिला है तब कुछ छूट तो नहीं गया....बढ़िया ब्राण्ड का है या नहीं...गाड़ी मिली है तो कितने की है... बंगला या ज़मीन मिली है तो कहाँ कहाँ है....???


 भारतीय संस्कृति में विवाह और जीवन में आने वाली खुशियों को नसीब माना जाता है। अगर नसीब अच्छा तो बेटी ससुराल में खुश रहेगी और खराब रहा तो दुखी रहेगी । बस यही मनगढ़ंत छोटी सी परिभाषा लोगों ने जीवन की गढ़ ली। इस सोच की वजह से शादी एक जुआ बन गई है।अपनी गलतियो को हम नसीब या भाग्य का नाम देकर ढकेल देते है।

भारतीय सौलह संस्कारों में विवाह एक पवित्र संस्कार है। माता-पिता कन्यादान करते है। प्राचीन काल में विवाहोपरांत नव दम्पति अपना एक नया घर बसाते थे जिसे गृहस्थी कहते थे। विवाह संस्कार के दौरान नव दंपतियों के नव गृहस्थ जीवन की शुरुआत हेतु दान किया जाता है। जीवन गुजर-बसर हेतु सभी व्यक्ति जिनमें परिचित, रिश्तेदार, परिवारजन अपने श्रद्धा अनुसार थोड़ा-थोड़ा वस्तु या धन-दान करते थे। जिनसे उनकी गृहस्थी शुरुआती दौर में अच्छे से चल सकें। धीरे-धीरे यही परंपरा दहेज बन गई। दहेज अर्थात वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष को धन या वस्तु भेंट करते हैं ।

दहेज के लोभी पद पैसा और ज़मीन के बल पर दहेज की मांग करते है।

सामाजिक रूतबा रखने के लिए अपने आप को अमीर दिखाते है वरना उन्हें भीख माँगनी पड़ती है और इस सामाजिक भीख को वह प्रतिष्ठा का नाम देते है। लेकिन वास्तविक तौर पर देखा जाए तो ये अंदरूनी गरीब ही होते है ।

कुछ लोग दहेज लेने के चक्कर में इतने शरीफ बनते हैं की समाज परिवार में अपने आप को ऐसे पेश करते हैं की जैसे वह दहेज के खिलाफ है। दहेज का ₹1 भी लेना पसंद नहीं करते। लेकिन अंदरुनी हकीकत यह होती है की उनकी लालसा अधिक से अधिक दहेज प्राप्त करने की रहती है। वह वधु पक्ष से धन लाने या सामान पर ऐसी क्रिया- प्रतिक्रिया करते हैं ताकि उन्हें दहेज ज्यादा से ज्यादा मिल सके। इस दहेज के लालच में एक बेटी या उसके परिवार को कई प्रकार के ताने देकर या उलहाने देकर आत्महत्या करने तक मजबूर कर देते हैं।  बेटी आत्मनिर्भर न होने पर विकराल स्थितिया हो जाती है और आत्मनिर्भर हो तब भी ये दहेज लोभियों की लालसा और बढ़ जाती है। यह कुप्रथा एक कलंक है।


 एक माता पिता अपने जिगर के टुकड़े को अपने से अलग एक अनजान व्यक्ति को सौंपते है....क्या ये त्याग तुम्हें कम लगता है??? 

 जो तुच्छ वस्तुओं और धन के लालच में भूल जाते हो ?

क्या एक व्यक्ति का जीवनयापन बोझ लगता है ?

 एक व्यक्ति तुम्हारे लिए अपना वजूद,अपना अस्तित्व समाप्त कर तुम्हारी जीवनरूपी नैया को खेने हेतु जीवनसाथी या हमसफ़र बनने के लिए खुशी खुशी तैयार होता है ...कैसे तुम सब इस त्याग को अनदेखा कर सकते हो...???

जीवन यापन के लिए पैसा पद प्रतिष्ठा आवश्यक है लेकिन इन सब से ज्यादा जरूरी है खुशहाल ज़िन्दगी। अगर दुल्हन तुम्हारे साथ से खिलखिला उठे और हँसते हुए जीवन बीत जाये तो समझना तुमने इस धरती पर जन्म लेकर माँ वसुंधरा को निहाल कर दिया।

विवाह एक पवित्र संस्कार है  दो आत्माओं का मिलन है, दो परिवारों का संगम है इसे दहेज की बलि मत चढ़ाइए। एक इंसान आपके लिए पूरा परिवार छोड़कर आता है और अपने आप को भूलकर तुम्हारे परिवार को अपना मान लेता है, पूरा जीवन समर्पित करता है तो इतनी तो लज्जा बनाए रखिये की उनसे दहेज की डिमांड न करें। श्रद्धावश जो दिया गया है उसे नतमस्तक होकर स्वीकार करे और जो इंसान  तुम्हें मिला है उसका ख्याल रखे। सच मानिए जहाँ भूख न होकर सम्मान के साथ रिश्ते बनते है और निभाये जाते है वहाँ ईश्वर भी मेहरबान रहता है।


डाॅ.अरुणा गुर्जर 

व्याख्याता

आज का सुविचार :-जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि ।


हर इंसान की सोच ही उसके जीवन को बनाती है। व्यक्ति को जैसा रुचता है वैसा ही वह वातावरण तैयार करता है। आसपास की परिस्थितियां और वातावरण मनुष्य की सोच और कल्पनाओं का ही परिदृश्य होता है। कुछ लोग सब कुछ खोकर भी बहुत कुछ पा लेते है तथा कुछ लोग ऐसे भी है जो सब कुछ पाकर भी कुछ नहीं पा सकते। ईश्वर द्वारा उच्च भाग्य रूपी वरदान प्राप्त होने पर भी उसका सम्मान न कर पाने के कारण अभागे ही रहते है। अपनी सोच और कर्मशीलता ही जीवन का प्रतिबिंब है..... तुलसीदास जी ने कहा है ...सकल पदारथ है जग माहि.. कर्म हीन नर पावत नाही।।

डाॅ.अरुणा गुर्जर 😊🙏

देवनारायण की शिक्षाए

 यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।” 


 जब जब भी धरती पर धर्म की हानि आवश्यकता से अधिक होती है निर्दोष लोगों पर अत्याचार होने लगते हैं । हिंसक घटना क्रम होने लगते हैं, अपराधी तत्वों की बढ़ोतरी होने लगती है, मनुष्य में पाप बढ़ने लगता है, तब तब भगवान राक्षसों व आततायियों का संहार करने के लिए धरती पर अवतरित होते हैं ।

भक्तों की रक्षा हेतु, उन्हें सन्मार्ग पर लाने हेतु ,धर्म संकट से उबारने हेतु, भगवान धरती पर अवतरित होते हैं। 




बगडावत द्वारा धर्म का पालन करने पर भी राण के राजा दुर्जन साल द्वारा निर्दोष जनता पर अत्याचार किए गए और नरसंहार किया गया । उनकी त्राहि-त्राहि सुनकर भगवान विष्णु देवनारायण के रूप में धरती पर अवतरित हुए।

विष्णु अवतारी भगवान देवनारायण ने मानव जीवन के धर्म की रक्षा की, अपने वंश की रक्षा की तथा अपने कुल पुरुषों के खोए हुए गौरव को उन्हें पुनः लौटाया।

ग्यारह कला अवतारी भगवान देवनारायण तेजस्वी, शक्तिशाली ,शूरवीर साहसी, क्रांतिकारी थे। अलौकिक कार्यों से युक्त, असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे। जनता के पालक पोषक और रक्षक थे। छोटी उम्र में ही अत्यधिक बुद्धिमान और नीति निपुण थे। दुष्ट को दंड अवश्य देते थे पर हिंसा और खून खराबे से नहीं । उनका दंड देने का तरीका अहिंसा युक्त था। उनका यशस्वी जीवन अद्भुत कौशल और कार्यों का संगम है।

भगवान देवनारायण के जीवन से हमें बहुत सी विशेषताएं और शिक्षाए मिलती हैं । जिन्हें हम जीवन में अनुकरणीय बनाकर अपने मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकते हैं। भगवान देवनारायण गरीब कृषक गुर्जर जाति में उत्पन्न हुए थे। साधारण किसान के रूप में जीवन यापन करते हुए गायों का पालन पोषण किया था। गायों की प्रति प्रेम और निष्ठा अनुकरणीय है । गाय का दूध सुपाच्य और पोषण युक्त होता है। उन्होंने गाय के दूध का महत्व बतलाया। पूजा के लिए गाय का कच्चा दूध ही चढ़ाया जाता है । गाय की  महता बढ़ाई। देवनारायण की पूजा स्थल के लिए गाय के गोबर से लीपकर ही पूजा चौकी का निर्माण किया जाता है। लोगों की शारीरिक और मानसिक व्याधियों को रोकने के लिए  आयुर्वेद पर बल दिया। अनेक बीमारियों का आयुर्वेद के माध्यम से इलाज किया। नीम वृक्ष को नारायण के रूप में पूजवाया। नीम की पत्तियों को प्रसाद के रूप में काम मे लेने पर बल दिया। स्वयं की मूर्ति के स्थान पर मिट्टी की बनी ईंटों की पूजा करने पर बल दिया । इसलिए इन्हें ईंटों का श्याम कहा जाता है। मिट्टी से बने कच्चे घर और केलु का प्रयोग करने पर बल दिया । जिससे वातावरण शुद्ध रहे। व्यक्ति स्वस्थ और निरोग रह कर जीवन यापन कर सकें।  वर्तमान जीवन में कोरोना और लम्बी जैसी महामारी को देखते हुए हमें भगवान देवनारायण के जीवन से बहुत सी अनुकरणीय शिक्षाएं ग्रहण करनी चाहिए। प्रकृति प्रेम भगवान देवनारायण वृक्षों की पूजा करते थे जाल,नीम,इत्यादि वृक्षों की रक्षा की। यह वृक्ष पर्यावरण संरक्षण का कार्य करते हैं और वातावरण को शुद्ध बनाए रखने में मदद करते हैं ।

भगवान देवनारायण ने वनों की रक्षा की और उनके पूजा स्थल आज भी बन्नी के नाम से जाने जाते हैं जहां पर वृक्षों को काटना अपराध माना जाता है।


किसानों के मसीहा: विजय सिंह पथिक

  डाॅ.अरुणा गुर्जर  व्याख्याता, भीलवाड़ा यश वैभव सुख की चाह नहीं, परवाह नहीं, जीवन न रहें, यदि इच्छा है, तो यह है जग में स्वेच्छाचार दमन ना ...