डॉ. अरुणा गुर्जर, व्याख्याता, भीलवाड़ा
राजस्थान की भूमि वीर प्रसूता है । इसके कण-कण में वीरता, शौर्य की अनुगूंज सुनाई देती है। इस माटी के लाल जन्म से ही मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व होम करने का प्रण लेकर जीवन आरंभ करते हैं। इस वीर प्रसूता की माटी में ऐसे कई महापुरुषों के गुणगान सुने जा सकते है। त्याग, बलिदान, वचन निर्वाह, साहस, अहिंसा, मातृभूमि की रक्षा इत्यादि अकूत गुणों से पूरित ये महापुरुष जन-जन के कण्ठाहार बन जाते हैं। प्रातः स्मरणीय इन महापुरुषों की गाथाओं का समाहार हमारी संस्कृति और साहित्य में मिलता है। राजस्थानी साहित्य में विभिन्न लोक देवताओं, महापुरुषों, विदुषियों,वीरांगनाओं की गाथाएं मिलती है। इन गाथाओं में शौर्य, वीरता, त्याग, वचनबद्धता, नीति, मर्यादा के साथ देवत्व भाव का सांगोपांग सांस्कृतिक चित्रण मिलता है। तेजाजी, देवनारायण जी, गोगाजी, पाबूजी, रामदेव जी, डूँगजी- जवाहर जी, निहाल दे सुल्तान, ढोला-मारू, भर्तृहरि इत्यादि की वीर गाथाएं प्रसिद्ध है... आईये आज हम लोकदेवता तेजाजी के बारे मे जानते है-
प्राण जाए पर वचन न जाए कहावत तो आपने सुनी होगी। इस कहावत को चरितार्थ करने वाले हमारे प्रिय लोक देवता तेजाजी महाराज जिन्होंने गौ रक्षा और अपने वचनों का पालन करते हुए हंसते-हंसते अपने प्राण त्याग दिए । भगवान शिव के 11 वें अवतार, काला और बाला के देवता, किसानों के रक्षक, गौ-रक्षक, नागों के देवता, तेजाजी का जन्म माघ सुदी चौदस विक्रम संवत 1130 को नागौर जिले के खरनाल गांव में हुआ था। पिता ताहड़ दे, माता राम कुवंरी के गर्भ से धोलिया गोत्र जाट परिवार में हुआ। पिता ताहड़ दे खरनाल (नागौर) के मुखिया थे। माता किशनगढ़ (अजमेर) की निवासी थी। दोनों शिव भक्त थे। ऐसी मान्यता है की माता राम कुंवरी को नाग देवता के आशीर्वाद से पुत्र तेजा की प्राप्ति हुई। जब तेजाजी का जन्म हुआ तो उनके मुख पर अद्भुत तेज था। उन्हें देखकर उनका नाम तेजा रखा गया। कहावत है कि पूत के पाँव पालने मे दिख जाते है। तेजाजी बचपन से ही सत्यवादी, प्रखर और रक्षक बनकर उभरे। राजल दे तेजाजी की प्रिय बहन थी। तेजाजी के तेजस्वी स्वरूप को देखकर पनेर के रायमल जी ने अपनी पुत्री पेमल का विवाह तेजाजी के साथ करने का निश्चय किया। जब तेजाजी का विवाह हुआ तब तेजाजी 9 माह के थे। और पेमल 6 माह की थी। विवाह बुद्ध पूर्णिमा विक्रम संवत 1131 को संपन्न हुआ। पेमल के मामा खाजू काला थे। विवाह के कुछ समय बाद मामा खाजू काला और जो पिता ताहड़ जी मे विवाद हो गया। खाजू काला धोलिया परिवार से दुश्मनी रखते थे। वे इस रिश्ते के पक्ष में भी नहीं थे। खाजू काला जी इतने क्रूर हो गए कि उन्होंने ताहड़ दे पर हमला कर दिया। अपने और अपने परिवार की रक्षा के लिए ताहड़ दे जी को तलवार से खाजू काला को मारना पड़ा। इस अवसर पर तेजाजी के चाचा आस करणजी भी उपस्थित थे। यह घटना सुन पेमल की मां को अच्छा नहीं लगा उसने ताहड़ दे जी और उनके परिवार से बदला लेने की सोची। विवाह के बाद हुई इस अप्रत्याशित घटना से दोनों परिवार स्तब्ध थे। दोनों परिवार ने विवाह को मान्यता नहीं दी। बचपन में विवाह होने की घटना से तेजाजी अनभिज्ञ थे। जब तेजाजी व्यस्क हुए तो उनके पास असंख्य गायें और घोड़े थे। लीलण घोड़ी उनकी प्रिय घोड़ी थी। प्रकृति-प्रेमी तेजा गांव मे गायें चराते। उन्हें प्रकृति और पशुओं के बारे मे, फसल और उनकी किस्मों, पशुओं के वंश,रोग,औषधियों के बारे मे बहुत जानकारी थी। उनके पास कई बीमार पशु आते और स्वस्थ होकर जाते थे। नागौर की भूमि पथरीली और अनूपजाऊ थी। तेजाजी वहाँ अपनी मीठी वाणी से गीत गाते-गाते उस भूमि को हल जोत उपजाऊ बना देते थे। वहाँ कुछ महीनों बाद फसले लहलहा उठती। एक दिन मां ने तेजाजी को अपनी बहन राजल देवी को ससुराल से लाने के लिए कहा। तेजाजी लीलण पर सवार होकर राजल के ससुराल पहुंचे और बहन को अपने साथ घर लिवां लाये। घर आकर जब खाना खाने बैठे तब तक खाना ठंडा हो चुका था। उन्होंने अपनी भाभी से कहा कि मुझे खाना गर्म करके दे दो। बड़ी भाभी उस समय क्रोध में थी इसलिए उन्होंने कहा की इतना ही गर्म खाना है तो पनेर से अपनी पत्नी पेमल को ले आओ। वही तुम्हें गरम-गरम पुए बनाकर खिला देगी। भाभी की यह बात सुनकर तेजाजी को बड़ा अचरज हुआ। उनको खुद के विवाह की जानकारी नहीं थी। उन्होंने अपनी मां से पत्नी पेमल के बारे में जानना चाहा। उनकी मां ने बचपन में हुए विवाह और खाजू काला की सारी घटना सुना दी । तेजाजी ने कहा कि मैं बचपन में हुए इस विवाह को स्वीकार करता हूं और अभी जाकर अपनी पत्नी को ले आता हूं ।तेजाजी आवेश में आकर माता के लाख मना करने पर भी बिना शगुन देखें अपने ससुराल पनेर की ओर रवाना हो गए। रास्ते में कई अपशगुन हुए लेकिन तेजाजी रुके नहीं। तेजाजी जब अपने ससुराल पहुंचे तो काफी अंधेरा हो गया था। ससुराल में किसी को यह अंदेशा नहीं था की पेमल के पति तेजाजी पधारे हैं। उन्होंने किसी अनजान व्यक्ति को समझ कर और बिना पूछे घर में घुसता हुआ देखकर अपशब्द कहे।तेजाजी वहां से पुनः लौट आए थोड़ा आगे उन्हें लाछा गुजरी मिली जो की पेमल की प्रिय सहेली थी । लाछा गुजरी से उन्होंने पेमल के बारे में पूछना चाहा। लाछा ने उन्हें बताया कि वह पेमल की बहुत अच्छी सहेली है। साथ ही पेमल की सुंदरता और व्यक्तित्व का गुणगान किया। उसने कहा कि आप एक बार पेमल से मिलो। तेजाजी को अपने घर रुकने के लिए बोला और कहां आप मेरे घर चलिए मैं आपकी बहन के समान हूं आप मेरे घर विश्राम कीजिए। पेमल भी आपसे मिलना चाहती है। तेजाजी लाछा गुजरी के घर विश्राम के लिए रुके। उधर लाछा गुजरी की गायों को मेर के मीणाओं ने बंधक बना लिया। शाम को जब लाछा की गायें घर नहीं लौटी तो लाछा उन्हें ढूंढने निकली। जब उसे पता चला की मेर के मीणाओं ने उसकी गायों को बंधक बना दिया है तो वह रोने लगी। उसे रोता हुआ देखकर तेजाजी ने उनसे बात की। लाछा को वचन दिया की बहन अब मैं तुम्हारी गायें लेकर लौटूंगा तभी तुम्हारे घर का अन्न- जल ग्रहण करूंगा। तेजाजी उसी रात मेर के मीणाओं की ओर बढ़ गए। प्रातः होते ही सीमा में प्रवेश कर गए, तलवारबाजी और भाले के रण कौशल से सभी मीणाओं को धराशायी कर दिया और बंधक गायों को छुड़ा लिया। सभी गाये लाछा के घर आ गई । एक बछड़ा पीछे छूट गया लाछा ने जब अपने सभी गायों को गिना तब उसने कहा कि मेरा एक अति प्रिय बछड़ा पीछे रह गया है। तेजाजी पुनः उस बछड़े को लेने मीणाओं की सीमा की ओर बढ़ चले। तभी सुरसुरा नामक स्थान पर एक ढेर मे अग्नि को जलते हुए देखा। अग्नि मे एक काला नाग जल रहा था। तेजाजी ने जब उसे जलते हुए देखा तो बचाने के लिए उसके पास पहुंचे। उन्होंने देखा की एक बड़ा सा काला नाग अग्नि में जल रहा है । तेजाजी ने अपने भाले से नाग को अग्नि में जलने से बचाया और बाहर निकाल दिया। इस बात से खफा नाग ने तेजाजी से कहा कि मैं अग्नि में जलकर अपने इस जीवन को नष्ट करके मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयास कर रहा था और तुम मुझे जलते हुए अग्नि से निकलकर मेरी मोक्ष प्राप्ति में बाधक बने हो। अब मैं अधजला हो गया हूं। ना में सही जीवन यापन कर सकता हूं और ना ही मोक्ष प्राप्त कर सका हूं। अतः क्रोधित होकर अब मैं तुम्हें डसूंगा। तेजाजी ने कहा कि मैं मेरी धर्म बहन लाछा के बछड़े को लेने जा रहा हूं जब उसे लेकर वापस लौटूंगा तब आप मुझे डस लेना। वासक नाग ने कहा कि मुझे आपकी बातों में सच्चाई नहीं लगती। तब तेजाजी ने कहा की सूर्य देवता हमारी इस बात के साक्षी हैं कि मैं बछड़े को छुड़ाकर वापस लौट कर सर्वप्रथम आपके पास अवश्य आऊंगा। वासक नाग ने तेजाजी को जाने की अनुमति दे दी। तेजाजी द्रुतगति से बछड़े को ढूंढने निकल पड़े। आगे मेर की सीमा पर सभी सैनिक युद्ध करने के लिए तैयार हो गए थे। तेजाजी को वापस आता देखकर सभी मीणाओं ने अचानक आक्रमण कर दिया। तेजाजी ने डटकर पूरी सेना का अकेले मुकाबला किया। अपनी तलवार और भाले के रण कौशल से हजार- हजार सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। इस युद्ध में स्वयं भी पूरे घायल हो गए । उनके पूरे शरीर से रक्त की धाराएं प्रवाहित होने लगी। उन्हें जब वह बछड़ा मिला तो उन्होंने उस बछड़े को मुक्त कराया और लाछा गुजरी के घर की ओर भेज दिया। तेजाजी युद्ध के बाद पुनः वचनानुसार वासक नाग के पास आए। वासक नाग वही अग्नि के पास तेजाजी का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने तेजाजी को वापस आता देखकर उनकी वचनबद्धता से प्रसन्न होकर उन्हें सत्यवादी की उपाधि दी और कहा कि तुमने अपना कहा वचन निभाया इसलिए जगत में सत्यवादी कहलाओगे। तुम्हारे शरीर पर जगह-जगह घाव है और एक भी स्थान ऐसा नहीं बचा जहां मैं तुम्हें डस सकूं तब तेजाजी ने कहा की हे नाग देवता आप मेरी जिव्हा पर डस लीजिए। यह घाव रहित है। तेजाजी की इस बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर वासक नाग ने वरदान दिया की आप जगत मे अमर रहोगे, तेजाजी नागों के देवता के रूप में पूजे जाएंगे। तेजाजी के थान की मिट्टी, गोबर की भभूत लगाने और राखड़ी बांधने से बड़े से बड़े सांप का जहर समाप्त हो जाएगा। ऐसा वरदान देकर वासक नाग में तेजाजी की जिव्हा पर डंक लगा दिया फिर वासक नाग पुनः अग्नि में कूद पड़े। नाग के जहर के प्रभाव से तेजाजी का पूरा शरीर नीला पड़ गया और वे बेसुध हो गए। उनकी लीलण घोड़ी यह सब दृश्य देख रही थी। तेजाजी को वीरगति प्राप्त करता देख घोड़ी ने तेजाजी को अपने ऊपर बिठाया और खरनाल की ओर द्रुतगति से रवाना हो गई। प्रिय लीलण घोड़ी बहुत वफादार थी। घोड़ी तेजाजी को अपने पीठ पर ढोती हुई अकेले खरनाल पहुँची। उसकी आँखों में आँसू थे । घर वालो ने जब यह दृश्य देखा तो विलाप करने लगे। पेमल को जब यह सब घटनाक्रम पता चला तो उसने तेजाजी के साथ सती होने का निर्णय किया। भाद्रपद शुक्ल दशमी संवत 1160 को खरनाल में तेजाजी के संग पेमल सती हुई। लीलण घोड़ी ने कई दिनों तक अन्न-जल ग्रहण नहीं किया । वीर, गौ-भक्त, सत्यनिष्ठ, वचनपालक तेजाजी की घर-घर में पूजा की जाती है। जाट जाति के कुल देवता है। सभी पशुपालक जाति के आराध्य देवता है। इनके पूजा स्थल थान कहलाते है ।प्राचीन 'थान' (चबूतरे) खुले आसमान के नीचे होते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि तेजाजी ने स्वयं कहा था कि वे बंधनों में नहीं, बल्कि स्वतंत्र रहकर भक्तों की पुकार सुनना चाहते हैं। खुली छत के नीचे चबूतरा बनाकर पत्थर पर लीलण पर सवार तेजाजी भाला हाथ मे लिए जीभ पर सर्पदंश को दर्शाती मूर्ति उकेरित होती है। धूप, दीप व घंटियों की आवाज से भोपा(घोड़ला) दोनों समय पूजा करते है। सुरसुरा नामक स्थान पर सर्प के रूप में तेजाजी के दर्शन किए जा सकते है। मूर्तियों में उन्हें हमेशा अपनी जीभ पर सर्पदंश लेते दिखाया जाता है। यह एक प्रतीक है कि शूरवीर तेजाजी शरीर के घावों (जो युद्ध में लगे थे) को अपवित्र मानकर केवल 'जीभ' को ही शुद्ध माना।यह सर्पदंश व वचनबद्धता का प्रतीक है। अजमेर के पास भावंता धाम नामक एक ऐसी जगह है जहाँ सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति को तेजाजी के नाम की तांती बांधी जाती है और वह बिना किसी दवा के ठीक हो जाता है। यहाँ आज भी विज्ञान और आस्था का अद्भुत संगम दिखता है। राजस्थानी में कहावत है— "खेता में तेजो, घर में गेणो" (खेत में तेजाजी का नाम लेना और घर में गहना/आभूषण होना ज़रूरी है)। तेजाजी किसानों के लिए सुरक्षा के सबसे बड़ा आधार हैं। खेती की शुरूआत से पहले तेजाजी के नाम की टेर/ आवाज/ गोठ गाई जाती है। तेजाजी के गीतों में केवल भक्ति नहीं, बल्कि वीर रस की प्रधानता है, जो सुनने वालों में जोश भर देती है। राजस्थान सरकार द्वारा 2018 में तेजाजी के जन्मस्थान खरनाल में एक भव्य वीर तेजाजी पैनोरमा बनाया गया, जहाँ अत्याधुनिक तरीके से उनके जीवन की झांकियां दिखाई गई हैं। नागौर और अजमेर के कई स्थानों पर तेजाजी की याद में छतरियां बनी हुई हैं, जो स्थापत्य कला का सुंदर नमूना हैं। तेजाजी ने पेमल की सहेली लाछा गुर्जरी की गायें बचाई थीं, उन लाछा गुर्जरी की याद में भी रंगबाड़ी (अजमेर) में पूजा होती है। यह भाई-बहन के पवित्र स्नेह और रक्षा का प्रतीक है। अजमेर के पनेर में तेजाजी के साथ उनकी पत्नी पेमल की भी पूजा होती है। यह मंदिर पति-पत्नी के अटूट प्रेम और बलिदान का गवाह है। तेजाजी के थान(स्थान) पर हर जाति और धर्म के लोग आस्था रखते है। यह सांप्रदायिक सौहार्द के बहुत बड़े प्रतीक हैं। केवल सर्पदंश ही नहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में जब किसी पालतू पशु की टांग टूट जाती है या वह बीमार होता है, तो तेजाजी के नाम का धागा (तांती) बांधा जाता है। तेजाजी के थान की भभूत और धूल के लगाने से पशु ठीक होने लगते है। ठीक होने पर भक्त मन्दिर और मेले में प्रसाद चढ़ाते हैं।
तेजाजी ने लाछा गुर्जरी की केवल गायें ही नहीं बचाईं, बल्कि उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि गौ-रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करना सबसे बड़ा धर्म है। तेजाजी की मूर्तियों में उनके पास हमेशा एक भाला और ढाल होती है। उनकी घोड़ी लीलण का मुँह अक्सर तेजाजी की ओर मुड़ा हुआ दिखाया जाता है, जो उनकी अटूट वफादारी का संकेत है। तेजाजी के अनुयायी केवल हिंदू ही नहीं हैं, बल्कि कई अन्य समुदायों के लोग भी उन्हें 'वीर पुरुष' और 'रक्षक' के रूप में मानते हैं। उनके मंदिरों में होने वाली आरती और भजन सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करते हैं। तेजाजी का जीवन एक ऐसी अमर गाथा है जो हमें सत्य, निडरता और ईमानदारी से जीना सिखाती है। तेजाजी महाराज की याद में राजस्थान के कई जिलों में भव्य मेले आयोजित होते हैं, जिनमें परबतसर का पशु मेला सबसे विशाल और ऐतिहासिक है। इसकी शुरुआत मारवाड़ के राजा अजीत सिंह के काल में हुई थी। यहाँ तेजाजी की एक प्राचीन मूर्ति जोधपुर से लाकर स्थापित की गई थी। परबतसर पशु मेला केवल व्यापारिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक, सभ्यता और आस्था का उत्सव है। इस मेले में नागौरी बैलों की प्रदर्शनी व बिक्री दुनिया भर में प्रसिद्ध है।पशु मेले का मुख्य आकर्षण नागौरी बैल और ऊंटों की खरीद-फरोख्त है। भाद्रपद शुक्ल दशमी (तेजा दशमी) से शुरू होकर पूर्णिमा तक। यह राजस्थान के सबसे बड़े मेलों में से एक है । यहाँ राजस्थान की लोक संस्कृति, गैर नृत्य, और तेजाजी के गोठा (गायन) का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। खरनाल का मेला (नागौर) तेजाजी की जन्मस्थली खरनाल में भी तेजा दशमी पर विशाल मेला भरता है। लाखों श्रद्धालु यहाँ दर्शन करने और धोक लगाने आते हैं। सुरसरा (अजमेर) तेजाजी के निर्वाण स्थल पर श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं और नारियल चढ़ाते हैं। सेंदरिया (अजमेर) जहाँ तेजाजी को नाग ने डसा था, वहाँ भी हर साल मेला लगता है। भावंता (अजमेर) यहाँ सर्पदंश से मुक्ति की कामना के लिए भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। तेजा दशमी के दिन राजस्थान में सरकारी अवकाश भी रहता है और हर गाँव के तेजाजी के थान पर जागरण और मेले का आयोजन होता है। ऐसे महान कृषि कार्य के उपकारक देवता तेजाजी महाराज को हम बारम्बार प्रणाम करते है।