हर इंसान की सोच ही उसके जीवन को बनाती है। व्यक्ति को जैसा रुचता है वैसा ही वह वातावरण तैयार करता है। आसपास की परिस्थितियां और वातावरण मनुष्य की सोच और कल्पनाओं का ही परिदृश्य होता है। कुछ लोग सब कुछ खोकर भी बहुत कुछ पा लेते है तथा कुछ लोग ऐसे भी है जो सब कुछ पाकर भी कुछ नहीं पा सकते। ईश्वर द्वारा उच्च भाग्य रूपी वरदान प्राप्त होने पर भी उसका सम्मान न कर पाने के कारण अभागे ही रहते है। अपनी सोच और कर्मशीलता ही जीवन का प्रतिबिंब है..... तुलसीदास जी ने कहा है ...सकल पदारथ है जग माहि.. कर्म हीन नर पावत नाही।।
डाॅ.अरुणा गुर्जर 😊🙏
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