*शौर्य और पराक्रम के धनी बाघराव जी*
राजस्थान की वीर समरांगण मरुभूमि पर अनेक अवतार हुए। जनमानस की मौखिक गाथाएँ जन-जन के कंठों का हार है। बगड़ावत गाथा हमें संवाद रूप में और गीतों के रूप में मिलती है। यह गेय शैली में है। बगड़ावत गाथा का प्रमुख क्षेत्र मेवाड़ और मालवा रहा है। इस गाथा ने मेवाड़ और मालवा को एकाकार कर दिया है। प्राचीन समय में आध, आध के पुत्र जुगाध, जुगाध के पुत्र काजल, काजल के पुत्र मांडल, मांडल के पुत्र हरिसिंह, हरिसिंह के पुत्र बाघराव, बाघराव के चौबीस पुत्र बगड़ावत कहलाए। चौबीस में श्री सवाईभोज के पुत्र देवनारायण हुए।
बगड़ावत इतिहास अमिट और स्वर्णिम पन्नों पर अंकित हैं। धर्म,आदर्श, सच्चाई की राह पर चलने वाला यह गुर्जर समाज पूरे भारतवर्ष में फैला हुआ हैं। सद्गति का पालन करने वाले और निश्चल भाव के समाज में भगवान श्री देवनारायण का जन्म हुआ। सामाजिक समरसता के धनी भगवान श्री देवनारायण ने सभी धर्म के गरीब और असहाय वर्ग को ऊपर उठाया। भगवान श्री देवनारायण गुर्जर समाज की कुल देवता हैं अन्य सभी समाज अपने आराध्य देव के रूप में पूजा करते हैं। न केवल गुर्जर समाज अपितु सभी समाजों के लोग भगवान श्री देवनारायण की शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाते हुए प्रमाण स्वरूप ताम्बे की गोल धारण करते हैं।
जब जब धर्म और मान की हानि होती है तब तब ईश्वर मानव रूप में अवतार लेकर सभी दुष्टों का संहार करते है। भगवान श्री देवनारायण ने श्री सवाई भोज और माता साडु के पुत्र रूप में जन्म लिया। अपने पूर्वजों के साथ हुए अन्याय का बदला बुद्धिमानी से लिया।
9वीं शताब्दी में अजमेर, साभंर में चौहान वंश का साम्राज्य था। बीसलदेव द्वितीय राजा थे। इस समय मेवाड़ धरा पर सामन्त नियुक्त थे। मांडल रियासत में हरिसिंह गुर्जर सामंत रूप में राज करते थे।
नाग पहाड़ पर एक खूंखार सिंह का आतंक था। वह प्रतिदिन कई जानवरों और मनुष्य का शिकार करता था। शेर के आतंक से परेशान होकर जनता ने राजा ने दरबार में गुहार लगाई। बीसलदेव राजा ने ऐलान किया कि जो इस खूंखार सिंह को मार कर लायेगा उसे मुँह मांगा इनाम दिया जाएगा। कई व्यक्तियों ने प्रयास किया परंतु खूंखार सिंह का कुछ नहीं बिगाड़ सकें। जनता ने मिलकर सिंह के पास प्रतिदिन एक पशु और एक व्यक्ति को भिजवाने का नियम बनाया। उस क्षेत्र के प्रत्येक घर से प्रतिदिन एक व्यक्ति एक पशु को लेकर शेर का शिकार बनने जंगल में जाते थे। शेर का पेट भर जाता और वह दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाता था। उन्हीं दिनों मांडल के सामंत हरिसिंह गुर्जर एक कुम्हार के यहाँ रात्रि विश्राम हेतु रुके। उस घर में बुढ़िया और उसका बेटा रहता था। प्रातः काल सिंह का शिकार भेजने की बारी इन्हीं की थी। आपसी बातचीत चल रही थी की कौन शेर का शिकार बनने जाएगा ? यह वार्ता हरिसिंह ने सुनी। हरिसिंह ने कहा कि आप चिंता न कीजिए मैं भी आपके पुत्र के समान हूँ। कल मैं ही सिंह का शिकार बनने जाऊँगा। बुढ़िया के मना करने पर भी हरिसिंह नहीं माने और उन्हें वचनों में लेकर खुद शेर के पास चले गए। अपने साथ लाई बकरी को एक झाड़ के पास बांध दिया। तलवार लेकर सिंह के आने का इंतजार करने लगे। एक पहर बीतने के बाद शेर उस स्थान पर आया। हरिसिंह ने फुर्ती से तलवार की धार से एक ही वार में शेर की गर्दन धड़ से अलग कर दी। एक हाथ में रक्त रंजित तलवार और दूसरे हाथ में शेर के मुँह को लेकर अजमेर दरबार की ओर प्रस्थान किया। अजमेर के पास आते समय मार्ग में एक बावड़ी दिखी। उन्हें प्यास लगी थी।
प्यास बुझाने के लिए बावड़ी की ओर बढ़े। उस बावड़ी में एक साध्वी लीला सतवन्ती तपस्या करती थी । वह प्रातःकाल ब्रहमूर्हुत में शिव की आराधना करती थी। उसका नियम था की वह पूजा पाठ में किसी पुरुष का मुख नहीं देखती थी।
इस से अनजान हरिसिंह बावड़ी की ओर बढ़ चले। तलवार को एक तरफ रख ली। एक हाथ से सिंह मुख ऊंचा रख पानी पीने लगे। पानी के हिलने की आवाज से लीला सेवंती (सतवन्ती) का ध्यान भंग हुआ। उसने पानी की परछाई में एक सिंह का मुख और मनुष्य शरीर दिखाई दे गया। वह भयभीत हो गई कि कोई वनमानुष बावड़ी में जल पीने आया है। तभी हरीसिंह को वहाँ लीला सेवंती (सतवन्ती) की तपस्या भंग होने का भान हुआ। उन्होंने माफी मांगी, प्यास बुझाने हेतु इस ओर आने का प्रयोजन बताया। लीला (सतवन्ती) हरिसिंह की सच्चाई, वीरता,शौर्यता तथा सौंदर्य को देखकर मोहित हुई । उन्होंने संपूर्ण बात जानकर अपने आप को हरिसिंह को समर्पित करने का सोचा। लीला (सतवन्ती) में कहा कि आप बीसलदेव राजा के पास यह सिंह लेकर जाएंगे तो वह आपको वरदान मांगने के लिए कहेंगे तब आप विवाह हेतु मेरा हाथ राजा से मांग लेना।
इस प्रकार हरिसिंह और लीला (सतवन्ती) सेवंती का विवाह संपन्न हुआ । कुछ समय पश्चात उनके घर एक पुत्र को जन्म हुआ। जो अद्भुत था। सिंह का मुख और मनुष्य जैसा शरीर। तेज और ओज से युक्त ललाट था। लीला सेवंती इस बालक को देखकर डर गई। दासी को कहकर उसे जंगल में छोड़ने के लिए तैयार हो गई। मांडल के पास रूई मे लपेटकर जंगल में छोड़ दिया (इन्हीं की याद स्वरूप आज भी माण्डल मे नाहर नृत्य होता है।) एक कहावत है कि जाको राखे साइयां, मार सके ना कोई। उस बालक को रोता देखकर एक शेरनी पास आई और उसने अपना दूध पिलाया। बालक को जीवित रखा। कुछ दिनों बाद वहाँ से राहगीरों का एक दल गुजरा। राहगीरों ने रोते हुए इस अद्भुत बालक को देखा। उस अद्भुत बालक को अजमेर दरबार मे राजा तक पहुँचा दिया।
राजा बीसलदेव ने इस पुत्र के देखरेख की जिम्मेदारी हरिसिंह को दी। कहाँ की तुम इसका पालन पोषण करो । यह वीर बालक है और इसके तेज तथा ओजस्वी मुख को देखकर यह आभास होता है कि यह बालक इतिहास में अपनी अमिट पहचान बनाएगा। राजा का आदेश मान हरिसिंह और हरि इच्छा मान बालक को अपने घर ले आये। लीला सेवंती भी अपने पुत्र को पुनः अपने पास प्रकार बहुत खुश हुई। उसे अपने किए पर पछतावा हो रहा था। लेकिन पुत्र को पुनः प्रकार प्रफुल्लित हो गई। इस प्रकार यह बालक बड़ा हुआ।
अपनी ओजस्वी छवि, वीरता, शौर्य, पराक्रम के कारण बाघराव अपने क्षेत्र में काफी चर्चा में रहे। उन्हें देखकर सब डरते थे लेकिन उनके दयालु और दानवीर व्यवहार से सब प्रभावित होते। पुष्कर के पास उपवन की देखभाल की जिम्मेदारी उनकी थी। एक चतरा ब्राह्मण और बाघराव दोनों मिलकर बगीचे का भ्रमण करते। श्रावण के माह में कुछ कन्याएं वहाँ झूला झूलने आती थी । बाघराव जी उन्हें झूला झुलाते। भूलवश गोल गोल झूलते हुए भांवरे खा लिए। वयःअवस्था में जब उन कन्याओं के विवाह हेतु सावा निकाले तो नहीं निकले। तब उनसे पूछा गया तो उन्होंने बताया कि खेल खेल में हमने भांवरे ली। परिजन सभी कन्याओं को लेकर बाघजी के पास पहुंचें उन्होंने भी अपनी भूल स्वीकार की तथा बारह गुर्जर कन्याओं के साथ उनका विवाह हो गया। एक कन्या चतरा ब्राह्मण के साथ ब्याही उनकी संतान गरूड़िया ब्राह्मण कहलाई। बारह ही रानियों को लेकर बाघरावजी बदनोर रियासत में रहने लगे। उन्होंने बारह ही रानियों के नाम से तालाब और बावड़ियाँ बनाई।
डाॅ.अरुणा गुर्जर
व्याख्याता