डाॅ.अरुणा गुर्जर
व्याख्याता, भीलवाड़ा
यश वैभव सुख की चाह नहीं, परवाह नहीं, जीवन न रहें, यदि इच्छा है, तो यह है जग में स्वेच्छाचार दमन ना रहे- विजय सिंह पथिक
और लोग सिर्फ बातें करते हैं परंतु पथिक सिपाही की तरह काम करता है- महात्मा गांधी
रोबिला चेहरा, चौड़ी छाती, लंबा बदन, मुख पर ओज, निडर व निर्भीक व्यक्तित्व के धनी, किसानों के मसीहा, सहज व सरल भाषा के धनी, क्रांतिकारी व्यक्तित्व के धनी,राजस्थान केसरी विजय सिंह पथिक भारतीय स्वतंत्रता के प्रमुख सेनानी रहें।
भारत कई सदियों तक विदेशी आक्रांताओं की जंजीरों में कैद रहा। इस धरा पर ऐसे अनेक वीर स्वतंत्रता सैनानी हुए जिन्होंने भारत की भूमि को आजाद करने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया। अपना सर्वस्व लुटा दिया।
राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक नायाब हीरा विजय सिंह पथिक उर्फ भूप सिंह। अपने नाम के अनुसार ही योद्धा साबित हुए। पथिक अर्थात राही। वास्तव में स्वतंत्रता आंदोलन की सेनानियों में अग्रणी राही रहे । इन्हें राष्ट्रीय पथिक के नाम से भी जाना जाता है। पथिक जी का जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के गांव गुढ़ावली में 28 फरवरी 1882 को गुर्जर परिवार में हुआ । इनका पूरा परिवार क्रांतिकारी था। दादा इंदर सिंह गुर्जर बुलंदशहर की मालगढ़ रियासत के प्रधानमंत्री थे। पिता हमीर सिंह गुर्जर क्रांतिकारी थे। माता कमल कुमारी देशभक्त थी।
एक बार इनके पिता बीमार थे तथा अंग्रेज उन्हें गिरफ्तार करने आए पिता के बीमार होने से वह लड़ नहीं सकते थे । कमल कुमारी को जब इस बात का पता चला कि अंग्रेज उनके घर पर धावा बोलने वाले हैं तो कमल कुमारी ने डंडा उठा लिया। अंग्रेजों से पंगा लेने के लिए अकेले घर के बाहर खड़ी हो गई। उन्हें खुली चुनौती दे दी। कमल कुमारी की वीरता से अंग्रेजों के छक्के छूट गए। सभी को वहां से भागना पड़ा। मां की वीरता, साहस और निर्भीकता पथिक जी के खून में आई। पथिक जी में पारिवारिक परिवेश से ही देशभक्ति और क्रांतिकारी भावना पल्लवित होने लगी।
बड़े होने पर रास बिहारी बोस और सचीन्द्र सांन्याल जैसे महान क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। 1911 में जब भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली लाई गई तब लॉर्ड हार्डिंग ने एक विशाल रैली निकाली। इस रैली में बम फेंकने का कार्य कुछ क्रान्तिकारियों को सौंपा गया। जिनमें पथिक जी भी शामिल थे। होर्डिंग बच गया उसका महावत मारा गया। सभी क्रांतिकारियों को पकड़ने का ऐलान हुआ। क्रांतिकारी वहां से फरार हो गए तथा अंग्रेजों के हाथ नहीं आए। रास बिहारी बोस के नेतृत्व में क्रांतिकारियों द्वारा 1857 की क्रांति की तर्ज पर 21 फरवरी 1915 को गदर आंदोलन किए जाने की योजना बनाई गई। राजस्थान में इसका दायित्व विजय सिंह पथिक को दिया गया। इसे प्रथम लाहौर षड्यंत्र के रूप मे जाना गया। इसकी भनक अंग्रेजो को लग गई। फिर फिरोजपुर षड्यंत्र केस से फरार पथिक जी राजस्थान में गोपाल सिंह खरवा के वहां रह रहे थे दोनों ने मिलकर 2000 युवक 30000 बंदूक एकत्र कर ली थी। दुर्भाग्य से अंग्रेजों को इसका पता लग गया। अंग्रेज कमिश्नर ने गिरफ्तार करने का ऐलान कर दिया।
पथिक जी अपनी पहचान छिपाकर बिजोलिया आ गए। बिजोलिया उस समय ऊपरमाल के नाम से जाना जाता था। 1916 में बिजोलिया के सामंत कृष्णदास ने कई अत्याचारी कदम उठाये। उसने चंवरी कर लगाया जिसमें लड़की की शादी होने पर ₹5 जागीरदार को जमा करने होते थे। इस अतिरिक्त कर से परेशान होकर कई किसानों ने अपनी पुत्री की शादी को स्थगित कर दिया था। साधु सीताराम के नेतृत्व में किसानों ने चंवरी कर को मुक्त करने की कोशिश पर की पर सामंत टस से मस न हुआ। पृथ्वीराज सामन्त ने उत्तराधिकारी कर लगा दिया। पथिक जी को यहाँ के किसानों पर लगाये गए 84 प्रकार के करों के बारे मे पता चला। तब साधु सीताराम के साथ किसान आंदोलन के नेतृत्व करने का बीड़ा उठाया। पथिक जी ने सभी जनता को अपने अधिकारों के लिए सचेत किया। प्रेरित होकर किसानों ने विरोध स्वरूप तीन कदम उठाए । पहला- ठिकाने की भूमि पर खेती नहीं करना, दूसरा -ठिकाने को लगान नहीं देना, तीसरा- ठिकाने में सभी कर बंद कर देना ।
यह तीनों प्रयास विजय सिंह पथिक के प्रेरित करने से हुआ था । विजय सिंह पथिक के क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित होकर ऊपर माल की जनता ने सामन्तों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। जिससे सामंत घबरा गया। लगान न मिलने से उसकी अर्थव्यवस्था चरमरा गई। बिजोलिया किसान आंदोलन असहयोग व पूर्ण अहिंसात्मक आंदोलन था। पथिक जी ने विचारों ने जोश का संचार किया उन्होंने कहा - यदि तुम पढ़े लिखे हो और देश की स्थिति की जानकारी होकर भी इतने निर्बल हो कि कुछ नहीं कर सकते या इतने गौर स्वार्थी हो कि देश हित के लिए कुछ भी त्याग नहीं कर सकते या ऐसे मोहग्रस्त हो की गृहस्थी तुम्हें कर्तव्य पथ से धकेल कर सड़े गले राह में डाल देता है तो यह उचित ही है कि तुम गुलामी की जंजीरों में ही झकड़े अपना जीवन व्यतीत करते रहो, ऐसी अवस्था में वह भूल करते हैं जो तुम्हें देशहित का पवित्र मंत्र सुनाते हैं क्योंकि तुम उनके उत्तराधिकारी नहीं। याद रखो कि यदि तुम इस अवसर पर बेकार बने रहे तो तुम्हारा उद्धार इतनी सरलता से नहीं होगा। इस प्रकार की क्रांतिकारी और जोशीले वचनों से जनता में जोश भर गया। जिसने भी सुना सभी ने एकजुट होकर आंदोलन शुरू कर दिया। जनता के दबाव के कारण सामंत को लगान में छूट देनी पड़ी । 84 में से 35 कर को माफ कर दिया गया । यह एक पूर्ण अहिंसात्मक आंदोलन की पहली सफलता थी। पथिक जी ने किसानों की एकता को बनाए रखने के लिए ऊपर माल पंचायत बोर्ड का गठन किया। पहले अध्यक्ष सरपंच मन्ना जी पटेल को बनाया गया। उन्होंने जगह-जगह पंचायत बोर्ड बनाएं। जनता को अंग्रेजों के आततायी शासन से बचाया। जनता की समस्या व उनके विचारों से अवगत कराने के लिए कई पत्र-पत्रिकाओं में पत्र लिख लिख कर भेजे। कानपुर से प्रकाशित गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रताप पत्रिका का विशेष योगदान रहा। इस पत्रिका ने किसान आंदोलन को समूचे भारत में चर्चा का विषय बना दिया। वर्धा से राजस्थान केसरी पत्र निकाला। अजमेर में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की। अजमेर से राजस्थान केसरी, नवीन राजस्थान पत्र निकाले। पत्र- पत्रिकाओं के साथ उपन्यास, कहानी संग्रह , निबंध इत्यादि भी लिखे। जिसमें अजय मेरु - उपन्यास, कल्पना कल्लोल -काव्य संग्रह, पथिक प्रमोद- कहानी संग्रह , पथिक निबंधवाली, पथिक विनोद, पथिक जी के जेल के पत्र इत्यादि क्रांतिकारी लेखनी नें क्रांतिकारी विचारों को साहित्यिक रूप से हमारे समक्ष प्रस्तुत किया। पथिक जी निर्भीक व निडर व्यक्तित्व के थे। उनके मूल्य, आदर्श, एक साहसी नेता के थे। उन्होंनें बेजुबान लोगों की सहायता की, किसानों की स्थिति को समझा और उन्हें उनका हक दिलवाया। पूर्ण स्वतंत्रता से पूर्व निरंकुश शासको से बचते रहे ।पथिक जी के जीवन का अंतिम पड़ाव काफी दुखद रहा, आश्रम में जीवन बिताया । कर्मपथ के योगी पथिक जी लू के शिकार हो गए। रुग्ण अवस्था में ज्वर तथा निमोनिया के कारण उनकी जीवन लीला समाप्त हुई । क्रांतिकारी योद्धा विजय सिंह पथिक 27 मई 1954 को महाप्रयाण कर गया । हे महापुरुष, हे युग दृष्टि, हे युग प्रवर्तक , हे किसान मसीहा, तुझे शत-शत नमन।
