शिक्षा और समाज

 शिक्षा और समाज 


जरुरी नहीं कि रोशनी चिरागो से ही हो...

शिक्षा से भी घर रोशन होते हैं...



            गुर्जर समाज के सभी प्रिय महानुभावों को मेरा सादर प्रणाम! आज मैं महत्वपूर्ण विषय पर आपके समक्ष कुछ प्रश्न  रख रही हूं जो गुर्जर समाज के लिए अति आवश्यक है। कुछ ऐसे प्रश्न है जो मन को उद्वेलित करते रहते हैं उन प्रश्नों को मैं आप सब के समक्ष रखती हूं 

पहला प्रश्न- गुर्जर समाज अन्य समाज से पिछड़ा हुआ क्यों है ? 

दूसरा प्रश्न - क्या शिक्षा प्राप्त कर लेने का मतलब केवल अक्षर ज्ञान प्राप्त करना है ?

तीसरा प्रश्न- शिक्षा को हम किन नजरियों से देखते हैं? 

चौथा प्रश्न -शिक्षा को अपने जीवन में कैसे अपनाते हैं?

पांचवा प्रश्न -शिक्षा द्वारा कितना ज्ञान ग्रहण कर पाते है? 

छठा प्रश्न -बुद्धिजीवी वर्ग सामाजहित कार्य से दूर क्यों हो जाते हैं?

यह सभी प्रश्न हमारी सामाजिक व्यवस्था और बदलाव तथा उन्नति के रूप में मन को उद्वेलित करते हैं की आखिर इन प्रश्नों का क्या जवाब हो सकता है और कहां हम चूक कर रहे हैं की इतना बड़ा समाज और योग्य जनों के होते हुए भी हमारे समाज में वह बदलाव नहीं आया है जिसकी हम आशाएं और अपेक्षाएं रखते हैं। सामाजिक विकास हेतु मेरे अपने निजी विचार कुछ इस प्रकार है-

समाज के बिना मनुष्य पशु समान है । समाज से ही व्यक्ति का महत्व है अतः समाज हित में ही व्यक्ति का हित निहित है। प्रत्येक व्यक्ति समाज में ही पल्लवित और पुष्पित होकर अपना जीवन यापन करता है समाज से ही उसकी महत्ता बढ़ती है। समाज में ही उसकी जीवन लीला समाप्त हो जाती है। ऐसी स्थिति में शिक्षा का महत्वपूर्ण दायित्व हो जाता है कि बालकों में सामाजिक भावना जागृत करें । उनमें दया, परोपकार, सहनशीलता, सौहार्द, सहानुभूति, अनुशासन इत्यादि सामाजिक गुणों का विकास करें। व्यक्ति को अपने समाज को उन्नत बनाने का हर संभव प्रयास करना चाहिए ।

आज के युग में मनुष्य का शिक्षा प्राप्त करना अति आवश्यक है। शिक्षा का मतलब अधिकांशत स्कूली शिक्षा से लेते हैं लेकिन मेरा मानना है की केवल अक्षर ज्ञान प्राप्त करना हमारा उद्देश्य नहीं होना चाहिए ।अधिकतर शिक्षा के नाम पर अक्षर ज्ञान प्राप्त करते हैं लेकिन उन अक्षरों का ,शब्दों का, कहां और कितना प्रयोग करना चाहिए इसका ध्यान नहीं रखते इस मर्यादा को भूल जाते हैं। शिक्षा का उद्देश्य अपने शारीरिक और मानसिक विकास के साथ-साथ शाब्दिक कौशल को विकसित करना, मानवता का पालन करना, नैतिक नियमों का पालन करना ,धर्म व मर्यादा का पालन करना ही असली शिक्षा है

वह जीवन ही क्या जीवन है जो काम देश के आ न सका  अर्थात्  ऐसा जीवन यापन करना चाहिए जो देश और समाज के लिए मिसाल बने। प्रत्येक समाज की सभ्यता और संस्कृति तथा उन्नति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होती है यदि वर्तमान पीढ़ी अपने शिक्षा का दुरुपयोग करेगी या सही शिक्षा प्राप्त नहीं करेगी तो वह अगली पीढ़ी को प्रेषित होगा और समाज का बदलना मुश्किल हो जाएगा अतः हमें व्यक्तित्व विकास, उन्नति, नैतिक मूल्य, माननीय गुण, चारित्रिकता पर ध्यान देना होगा सामाजिक कुरीतियों को दूर करना होगा । यही अगली पीढ़ी तक जाएगा और समाज में बदलाव की एक नई बयार चलेगी। 



वॉल्मार्ट के अनुसार- शिक्षा जीवन की तैयारी है।

बहुत जरूरी होती शिक्षा, सारे अवगुण धोती शिक्षा।

 ज्ञान के बहते सागर का, सबसे सुंदर मोती शिक्षा।

 अतः सबसे जरूरी शिक्षा रूपी पतवार है।  समाज को पूर्ण रूप से शिक्षित बनाने के लिए आवश्यक है । शिक्षा द्वारा ईमानदार,परिश्रमी, तथा कर्तव्य को, अपने दायित्व को भली प्रकार से समझने वाले उत्तम नागरिकों का निर्माण करना। समाज को पूर्ण रूप से शिक्षित करने और अन्य सभ्य समाजों के समकक्ष लाने के लिए समाज के ही समस्त शिक्षित वर्ग,अधिकारी ,कर्मचारी, व्यवसाई, उद्यमी आदि को समाज को बदलने का बीड़ा उठाना होगा।

 दुष्यंत कुमार ने कहा है- एक चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों ... इस दिए में तेल से डूबी हुई बाती तो है... समाज सेवा करने का जज्बा सभी बंधुओं के  हृदय में मौजूद है लेकिन कहीं ना कहीं वह सुषुप्त अवस्था में है उसे चिंगारी देनी होगी, आंतरिक भावना को जागृत करना होगा।

 ऐसा माना जाता है कि किसी भी समाज में बदलाव नहीं होने के तीन मुख्य कारण है- 1. गरीब वर्ग में हिम्मत नहीं होती 2. मध्यमवर्ग को फुर्सत नहीं मिलती  3.अमीर वर्ग को इसकी जरूरत नहीं रहती। इसलिए समाज दिनोंदिन पीछे धकेलता जाता है अतः समाज को ऊपर उठाने के लिए या पूर्ण रूप से सभ्य बनाने के लिए हमें अपने आप से शुरुआत करनी होगी।

स्वयं को कमजोर न समझें। हर छोटा बदलाव बड़ी कामयाबी का हिस्सा होता है। इसलिए अपने द्वारा की गई छोटी शुरुआत को कम न समझे, वह एक दिन बड़ा रूप ले लेगी। मंजिल तक चला तब अकेला था... कारवां गुजरता गया ...लोग जुड़ते गए... महफिले सजती रही... और कारवां बढ़ता रहा अर्थात् आप शुरुआत कीजिए धीरे-धीरे लोग आप से जुड़ने लगेंगे और एक दिन आप सम्मानजनक कार्य को पूर्ण कर पाएंगे।

सामने हो मंजिल तो,रास्ता ना मोड़ना।

जो मन में हो वह, ख्वाब ना तोड़ना।

 हर कदम पर, मिलेंगी कामयाबी तुम्हें।

बस सितारे छूने के लिए, कभी जमीं ना छोड़ना।

हम समाज सेवा का जो कार्य करें वह छोटे स्तर पर ही क्यों ना हो पर हमें अपने कर्तव्यों से अपने कर्मों से समाज हित के लिए कार्य करते रहना चाहिए 

एक माटी का दिया है ,जो सारी रात अंधियारे से लड़ता है।

 तू तो भगवान का दिया है, तू किस बात से डरता है। 

हथेली पर रखकर नसीब, तू क्यों अपना मुकद्दर ढूंढता है।

 सीख उस समंदर से जो, टकराने के लिए पत्थर ढूंढता है।

एक दीपक सूर्य के सामने जलता है सूर्य विशाल है और दीपक उसके समक्ष तुच्छ है परंतु फिर भी दीपक जलता है क्योंकि वह अपने अस्तित्व को जिंदा रखता है। अंधियारी रात में पूरी रात जलकर दीपक वातावरण को प्रकाशित करता है। अपने आसपास पहले अंधकार को हरता है जिस प्रकार दीपक अंधकार को हरकर प्रकाशित करता है उसी प्रकार हमें भी अपने जीवन में नेक कार्यों द्वारा दूसरों को प्रकाशित करने का कार्य करना चाहिए अतः दीपक के रूप में अपने आप को कभी छोटा ना समझे जो नेक कार्य आप कर रहे हैं वह सूर्य कि लौ से भी अधिक महत्वपूर्ण है....

डॉ. अरुणा गुर्जर 

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