सवाईभोज मंदिर का इतिहास:-
राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के आसींद तहसील की पूर्व दिशा में 2 किलोमीटर दूर स्थित ऐतिहासिक स्थल सवाई भोज मंदिर गुर्जर समाज का अंतरराष्ट्रीय तीर्थ स्थल है। नवीं- दसवी शताब्दी की प्रसिद्ध बगड़ावत गाथा जुड़ी हुई है। हरिराम गुर्जर के पुत्र बाघ राव हुआ। जिनका मुख बाघ के समान और शरीर इंसानों जैसा था। इसलिए उनका नाम बाघ राव पड़ा। हष्ट-पुष्ट और वीरता से युक्त बाघ राव के बारह पत्नियां थी। सभी पत्नियों के दो-दो पुत्र हुए । कुल चौबीस पुत्र बगड़ावत के नाम से प्रसिद्ध हुए। सभी सर्वगुण संपन्न और धर्म प्रिय थे। दान पुण्य और जनहित कार्यों में लगे रहते थे।भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। उनके आशीर्वाद से उन्हें नाग पहाड़ पर स्वर्ण पोरसा, बंवली घोड़ी चंद्रासी खांडा और जयमंगला हाथी प्राप्त हुआ था। साथ ही बारह वर्ष की काया और बारह वर्ष की माया का वरदान प्राप्त हुआ। स्वर्ण पोरसे की यह विशेषता थी कि उसे जितना काटो उतना ही वह बढ़ जाता था। सभी भाई वरदान से प्राप्त संपदा को गरीब,असहाय लोगों में बांट देते। उन्होंने कई तालाब बावड़िया, धर्मशालाएं बनवाई, वृक्षारोपण किया। जिनके प्रमाण आज भी मेवाड़ मे देखे जा सकते हैं। यहां कई प्राचीन तालाब हैं जो उनकी गाथा को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करते हैं। चौबीस भाइयों ने अपने नाम से चौबीस खेड़े बसाये। बाघराव के पुत्र सवाई भोज और माता साडू को भगवान विष्णु ने पुत्र रूप में जन्म लेने का वचन दिया। वचन पालनार्थ संवत 968 माघ सुदी सप्तमी को मालासेरी की डूंगरी पर देवनारायण का जन्म हुआ। अपने अलौकिक कार्यों से लोगों के कष्ट हरे । राजधानी गोठा, आसींद, मालासेरी, बदनोर, खेडा चौंसला, देवमाली, देव डूंगरी, जोधपुरिया,भिनाय से लेकर मालवा तक की धरती पर उन्होंने अपना परचा दिया।
वर्तमान में प्राचीन सवाई भोज मंदिर की धरती पर सवाई भोज की धड़ की स्वत: उद्भवित मूर्ति है जिसके छाती पर आंखें हैं। यहां चौबीस भाइयों की याद में चौबीस खंभों की छतरी बनी हुई थी ।यह छतरी ग्रेनाइट के पत्थरों से निर्मित थी। कालांतर में दीवार बनाकर प्राचीन मंदिर का निर्माण करवाया गया। प्राचीन मंदिर दसवीं शताब्दी मे निर्मित है। धीरे-धीरे इस मंदिर का विकास प्रारंभ हुआ। निरंतर प्रयास व विकास से वर्तमान सवाई भोज मंदिर एक भव्य, विशाल, सुंदर व आकर्षक मंदिर बन चुका है। श्री सवाई भोज मंदिर के अलावा यहां श्री देवनारायण का मंदिर, श्री माता साडू का मंदिर, भुणा जी का मंदिर ,पांचों भाइयों का मंदिर, रानी जयमती का मंदिर, शिव का मंदिर, नौ देवी देवताओं के मंदिर स्थित है ।
सवाईभोज प्रांगण में बने भुणा जी के मंदिर का निर्माण महाराजा भीम सिंह के काल में हुआ। तत्कालिक पुजारी जग्गा जी चेला रत्ना जी द्वारा संवत 1853 माघ सुदी पंचमी को इस मंदिर का कार्य पूर्ण करवाया गया। नियाजी के मंदिर का निर्माण महंत भैरू दास जी के समय में संवत 1916 में खमाण सिंह जी के समय किया गया। श्री सवाई भोज मंदिर के पास तीन खंड का नगार खाना था । इसका निर्माण बाघ दास जी द्वारा करवाया गया। परंपरा अनुसार जब कोई आपातकालीन स्थिति होती तब नगाड़ा बजा -बजाकर लोगों को जानकारी दी जाती थी । पुजारी देवा दास जी के समय बादल महल का निर्माण करवाया गया। सवाईभोज स्थल पर पूजा करने के लिए गुर्जरों की तेड़वा गोत्र का पुजारी या महंत नियुक्त करने की परंपरा रही है। पुजारियों के निवास हेतु इंद्रपोल के पास ही केलु के छपरे का निर्माण करवाया गया। वहीं रहकर सभी पुजारी सवाई भोज मंदिर की पूजा अर्चना करते थे। पुजारी देवदास के बाद प्रेमदास जी पुजारी बने। प्रेमदास जी की हत्या सन 1980 में हो गई। अनायास घटित इस घटना से उत्तराधिकारियों का चयन नहीं हो पाया । सवाई भोज मंदिर की भूमि जागीरदारी प्रथा के अनुसार मापी की जमीन सरकार द्वारा रिज्यूम करने की नौबत आ गई। इस समय सरकार द्वारा मंदिर के पुजारियों के नाम राजस्व रिकॉर्ड से हटाने का निर्णय हुआ । सवाईभोज स्थल की जमीन सरकार के पास चली जाने की नौबत आई। इसी समय देवस्थान विभाग उदयपुर के यहां वर्तमान सवाई भोज मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री लक्ष्मी लाल गुर्जर ने सवाई भोज एवं देवनारायण मंदिर ट्रस्ट का रजिस्ट्रेशन करवाया जो देवस्थान विभाग उदयपुर मे रजिस्टर्ड नंबर 2/81/22-5-1981 के क्रमांक पर रजिस्टर्ड है। प्रक्रिया में काफी प्रयास के बाद मंदिर ट्रस्ट बनने से सवाईभोज स्थल के विकास की श्रृंखला शुरू हुई। इसे ट्रस्ट के रजिस्ट्रेशन के बाद मंदिर पर लगी रिसीवरी को समाप्त करने का श्रेय गुर्जरों के गांधी श्री लक्ष्मी लाल जी को जाता है। अपने कर्मठ, सेवाभावी, ईमानदार, विनम्र व्यक्तित्व के धनी श्री लक्ष्मी लाल जी गुर्जर ने इस स्थल को संरक्षित करने और इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में अपना योगदान दिया। ट्रस्ट निर्माण के बाद पुजारी को महंत की पदवी दी गई। उत्तराधिकारियों के लिए वंश परंपरा ना होकर तेड़वा गोत्र के व्यक्तियों को ही महंत नियुक्त किया जाता है। प्रेमदास जी के बाद मोतीदास जी को महंत नियुक्त किया गया। उनके देवलोक गमन के बाद श्री भूदेव दास जी को सवाईभोज महंत नियुक्त किया गया । महंत भूदेवदास जी के बाद महंत सुरेश दास जी को नियुक्त किया गया। इस स्थान की एक विशिष्ट परंपरा है कि यहां नियुक्त ट्रस्ट अध्यक्ष व सदस्यों को निशुल्क सेवा देनी होती है। बिना पारिश्रमिक के सभी मंदिर में भगवान की सेवा करते हैं।






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