अजमेर के चौहान साम्राज्य में एक खूंखार शेर का आतंक था। जो प्रतिदिन कई जानवरों और व्यक्तियों का शिकार करता था। राजा बीसलदेव ने यह मुनादी करवा दी कि जो इस शेर को मारकर दरबार में पेश करेगा उसे मुंहमांगा वरदान दिया जाएगा। हरिसिंह गुर्जर ने अपनी तलवार के एक ही झटके से बाघ की गर्दन काट दी तथा राजा को साक्षी देने हेतु अपने एक हाथ में रक्त रंजित तलवार और दूसरे हाथ में शेर का मुख लेकर बीसलदेव के पास जाने लगे। पुष्कर के पास रास्ते में एक बावड़ी थी । जहां संन्यासी लीला सेवंती शापवश आराधना करती थी। वह सूर्योदय से पूर्व किसी भी पुरुष का मुंह नहीं देखती थी। उसे यह शाप था की वह जिस पुरुष का मुख देखेगी वैसा ही पुत्र प्राप्त हो जाएगा । संन्यासी होने के कारण उसने विवाह नहीं किया था। संयोगवश हरिसिंह अपनी प्यास बुझाने हेतु बावड़ी की तरफ बढ़ता है। बाघ का कटा हुआ सिर और रक्त रंजित तलवार लेकर बावड़ी में प्रवेश करता है। वह चांदनी रात में बावड़ी के अंदर पहुंचता है और तलवार को एक तरफ रख कर बाघ के मुंह को एक हाथ में पकड़े दूसरे हाथ से पानी पीने लगता है । पानी पीने की आवाज आने पर लीला सेवंती का ध्यान भंग होता है और उसकी नजर हरिसिंह को पानी पीते हुए पर पड़ती है। उसे बाघ का मुख और इंसान का शरीर दिखाई देता है। वह यह दृश्य देखकर डर जाती है। उन्हें बावड़ी से चले जाने की आज्ञा देती है। हरिसिंह इतनी रात बावड़ी मे स्त्री की आवाज सुन अचंभित होते है और हाथ जोड़कर प्रार्थना करते है कि वह पानी पीने आये है। अगर मुझसे कोई अपराध हुआ तो मुझे क्षमा करें। लीला सेवंती हरिसिंह की उदारता और विनम्रता को देखकर मोहित हो जाती है । शाप मुक्ति को वरदान समझ उन्हें इस प्रकार आने का प्रयोजन पूछती है। हरिसिंह बाघ को मारने की और राजा के समक्ष प्रस्तुत करने की सारी घटना सुना देते है। लीला सेवंती अपने शाप मुक्ति हेतु योग साधना के बारे मे बताती है। हरिसिंह को कहती है कि राजा जब आपको खुश होकर कुछ मांगने के लिए कहे तब आप मेरा हाथ उनसे मांग लीजिए। मैं आपको पति रूप में स्वीकार करना चाहती हूं। हरि सिंह प्रसन्न होकर वहां से विदा होता है और राज दरबार पहुंच जाते है। खूंखार शेर के आतंक से मुक्ति पाकर राजा बहुत प्रसन्न होते हैं और उन्हें रियासत दान देते हैं। कई हाथी, घोड़े, मोहरे प्रदान करते हैं और साथ ही लीला सेवंती का विवाह धूमधाम से कर देते हैं। दोनों विवाह पश्चात बदनोर रियासत का निर्माण करते हैं और सुख पूर्वक रहने लगते हैं । कुछ माह पश्चात लीला सेवंती एक पुत्र को जन्म देती है। वह पुत्र अनुठे शरीर वाला होता है। जिसका मुख सिंह जैसा शरीर इंसान जैसा होता है। ऐसे अजीबोगरीब पुत्र को पाकर दोनो डर जाते हैं और उसे जंगल में छोड़ आते हैं। लेकिन उसकी चिन्ता सदैव मन मे रहती है। कहावत है जाको राखे साईया मार सके ना कोई। जंगल मे रोते हुए की आवाज सुनकर शेरनी पास आती है। बालक कुछ दिन शेरनी का दूध पीकर जीवित रहता हैं। एक दिन कुछ व्यक्ति जंगल से गुजरते है।वहाँ उन्हें वह बालक शेरनी के पास खेलता हुआ मिलता है। लोगो को देखकर शेरनी दूर चली जाती है। वे रोते हुए छोटे बालक को लाकर राजा को सुपुर्द कर देते हैं। राजा हरि सिंह को बुलाकर सुपुर्द करता है कि आप इस विचित्र बालक की देखभाल करें और उसकी रक्षा करें। हरिसिंह अपने पुत्र को वापस पाकर बहुत प्रसन्न होते है और ईश्वर की इच्छा मानकर पुत्र का पालन पोषण करते हैं । बाघ अथार्त नाहर(शेर) जैसा मुख होने के कारण उनका नाम बाघ रखा जाता है। बचपन से ही वीर साहसी और पराक्रमी होता है। बलिष्ठ शरीर और रौद्र मुख के कारण सब उनसे डरते थे। राजा को सहयोग मिलने के कारण उन्होंने राव की उपाधि प्रदान की। तब से बाघराव के नाम से जाने जाते है। बाघराव वीर होने के साथ साथ विनम्र भी थे। राजा की सीमा और बाग बगीचो की देखरेख करते थे। उनके डर से पशु पक्षी भी नुकसान नहीं करते। होली के उत्सव पर उत्सुकता से भाग लेते और बगीचो मे अपनी क्रिडाए करते।
उन्हीं की याद में पूरे गांव में नृत्य और उत्सव का आयोजन किया जाता है। उस समय सभी बालक बाघ का सांग धर कर उनके साथ नृत्य करते और उत्सव मनाते। यही परम्परा आज भी चालू है। आज भी माण्डल मे उनकी स्मृति रूप मे नाहर नृत्य किया जाता है। सभी नृतक सफेद रूई से शरीर को ढककर नाहर अथार्त शेर का स्वांग धरते है । उल्लास और उमंग के साथ नृत्य करते है और गैरिये गैर खेलते है।

रोमांचक प्रसंग
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