बगड़ावत गाथा की महत्ता

 बगड़ावत गाथा की महत्ता






सहणी सबरी हूं सखी, दो उर उल्टी दाह।

दूध लजाणौं पूत सम, बलय लजाणौ नाह।।


राजस्थान की वीर मरभूमि पर अनेक वीर और विरांगनाए हुई है । इन्होंने अपने अमर कृत्यों से इतिहास में विशिष्ट पहचान बनाई । राजस्थान की वीर मरुधरा का कण-कण इनकी गाथा सुनाते हुए अनुभूत होता है ।कर्नल टाॅड तो ने कहा - राजस्थान में ऐसी कोई जगह नहीं है जहां थर्मोपल्ली जैसी रणभूमि न हो और नहीं कोई ऐसा नगर हुआ जहां लियोनीडास जैसा वीर पुत्र उत्पन्न ना हुआ हो।

राजस्थान की धरा पर शक्ति भक्ति और नीति की त्रिवेणी प्रवाहित हुई है।

राजस्थान की वीर गाथा में बगडावत लोक गाथा का विशिष्ट स्थान है । यह एक मौखिक श्रुत परंपरा है। भगवान देवनारायण की  गाथा का वाचन भोपा द्वारा जंतर वाद्ययंत्र के साथ किया जाता है। सर्वप्रथम मंगला चरण के रूप में गणेश सरस्वती की आराधना की जाती है और सरस्वती को याद करते हुए बगडावत लोक गाथा का वाचन किया जाता है। इस गाथा मे नवी से दशवी शताब्दी के बीच का वर्णन है।



बगडावत गाथा को फड़ के माध्यम से वाचन किया जाता है । यह राजस्थान की  सभी फड़ो से प्राचीन और लंबी है । बगडावत गाथा की फड़ का आकार डेड मीटर गुणा साढे आठ मीटर होता है । यह सफेद कपड़े पर पारंपरिक रंगों से निर्मित होती है ।यह फड़ एक चित्रपट्टिका है जिसमें गाथा से संबंधित विभिन्न पात्रों दृश्योंं  का चित्रण होता है । पारम्परिक रूप से चित्र समूहों के रूप मे गाथा के विभिन्न हिस्सों को उकेरा जाता है।  गाथा वाचन के समय यह फड़ चित्रित पार्श्व पर्दे का होना आवश्यक है ।यह फड़ संपूर्ण कथा को अपने में संजोए हुए हैं ।फड़ो का  वाचन एक विशिष्ट शैली में होता है। इसमें चित्र, संगीत और वार्ता का मेल होता है। लोकप्रिय भोपा द्वारा ओज रूप  से मनोरंजक तरीके से फड़ का वाचन किया जाता है ।


भगवान श्री देवनारायण की गाथा अति विशाल है। 

मेवाड़ की धरा पर हरिराम के वंशज बाघराव से यह कथा आरम्भ होती हैं । दयावीर दानवीर और साहसी बाघराव के चौबीस पुत्र ही बगड़ावत कहलाते हैं अपनी मातृभूमि की आन बान शान की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा कर यह 24 बगडावत इतिहास में अमर हो जाते हैं। जयमति की मानवीय भावना का आदर करते हुए उसे अपना उचित स्थान दिलाते हैं ।


बगडावत शिव भक्त थे। बौद्धिक चतुराई व कुशलता से इन्हें एक स्वर्ण पोरसा, अकूट खजाना, बंवली घोड़ी, जयमंगला हाथी,चन्द्रसी खाण्डा के साथ बारह वर्ष की काया और बारह वर्ष की माया का वरदान मिला।

 शिव से मिला स्वर्ण पोरसा  अद्भुत विशेषताओं  से युक्त था। उसे जितना खर्च करते वह उतना ही बढ़ता जाता। बगड़ावतो ने अपने वरदान में मिले धन को जनहित कार्य में लगाया ।जगह जगह चारागाह, धर्मशाला, बावड़िया तालाब खुदवाए। वृक्ष लगवाए तथा लाखों की तादाद में  पशुओं का दान किया।


एक नारी के मान सम्मान के लिए उन्होंने अपने धर्म भाई राणा दुर्जन साल से युद्ध किया ।युद्ध में वीरता के साथ अपने प्राणों की आहुति दी । खारी नदी के तट पर भयंकर युद्ध हुआ जिसमे सभी बगड़ावत और राणा राजा दुर्जनसाल के सभी योद्धा खेत रहे। अपने वंश की प्रतिष्ठा और धर्म के के लिए माता साडू की गोद में संवत 968 को भगवान श्री देवनारायण का जन्म हुआ। इन्हें विष्णु का अवतार माना जाता है। देवनारायण को पांच नाम से जाना जाता है देवजी उदाजी कृष्णा धर्मराज  नारायण।

 देवनारायण के जन्म के बाद माता साडू प्राण राजा दुर्जनसाल के अत्याचारों से बचाने हेतु अपने नवजात पुत्र को लेकर अपने पीहर मालवा  ले जाती है। वहां अपने पुत्र को युद्ध कौशल की शिक्षा दिलवाई । छोछू भाट के आगमन पर देवनारायण को अपने पूर्वजों का ज्ञान होता है।  अपनी सेना इकट्ठी पर अपने बिछड़े चार भाइयों को एकत्र करके राजा दुर्जन साल पर आक्रमण करते हैं। राजा दुर्जन साल  के अत्याचारों से  जनता को मुक्त करवाते है ।आयुर्वेद की विविध औषधियों से जनता की शारीरिक पीड़ा  को समाप्त करते हैं । अनेक जन मंगलकारी कार्य करते हुए बैशाख सुदी अक्षय तृतीया संवत् 999 को धाम वैकुंठ में पधारते हैं।


राजस्थानी लोक संस्कृति, साहित्य की परम्परा में लोकगाथाओ की समृद्ध परंपरा रही है। बगड़ावत लोक गाथा में हमें वीरता, त्याग,दया, प्रेम, रोमांच की शिक्षा मिलती है ।यह गाथा सबसे बड़ी गाथा के रूप में उभरकर सामने आती है। फड़वाचन में भोपा द्वारा नृत्य संगीत लय वादन का मनोरंजक रूप में  वाचन किया जाता है। भगवान देवनारायण से अपनी इच्छा पूर्ति हेतु पात्ती मांगी जाती है। मन की इच्छा पूर्ण होने पर  इनकी गाथा का वाचन करवाया जाता है । यह गाथा हमें आदर्श, वचन निर्वाह त्याग  इत्यादि गुणों की शिक्षा देती है । सभी गाथा में बगड़ावत कथा विशिष्ट महत्ता है।

वीरो की मरुधरा पर बज रही है हुंकार ।

जंतर संग बगड़ावत की बज रही है झंकार।।


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