परिश्रम और सफलता

 अथक परिश्रम, जुनून, धैर्य और सफलता का पर्याय: शिक्षित समाज


जमीं पे बैठ के क्या आसमां देखता है ।

परों को खोल जमाना उड़ान देखता है।

न हो उदास हाथ पर हाथ धरे बैठ ।

अपनी मायूसियत को दिल से निकाल। 

 परो को खोल जमाना उड़ान देखता है ।

लकीरे अपने हाथों की बनाना हमको है आता।

 वे कोई और होंगे जो अपनी किस्मत पे है रोते।

परो को खोल जमाना उड़ान देखता है ।

अपने भीतर वो जमीर जिंदा रख।

अपनी काबिलियत का वो तीर जिंदा रख।

 परों को खोल जमाना उड़ान देखता है ।

लहरों की तो फितरत ही है शोर मचाने की ।

मंजिल उसी की होती है जो नजरों में तूफान देखता है।

जमी पे बैठ के क्या आसमां देखता है।

 परों को खोल जमाना उड़ान देखता है।


गुर्जर समाज के बच्चे आने वाले समाज  के भविष्य का आईना है। पढ़े-लिखे नागरिक देश और समाज की वास्तविक पूंजी है। शिक्षा, ज्ञान और बुद्धिमानी के बल से ही हम परिवार समाज और देश को प्रगति के पथ पर ले जा सकते हैं। शिक्षित व्यक्ति समाज की रीड की हड्डी है। जितने व्यक्ति समाज मे शिक्षित होंगे समाज की नींव उतनी ही मजबूत होगी। शिक्षा हमारे ज्ञान को बढ़ाती है, हमारी स्किल अथार्त कला को बढ़ाती है, हमारी पर्सनलिटी अथार्त हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करती है ,शिक्षा हमें हर परिस्थिति, समस्या से निपटने हेतु तैयार करती है, हमारे दिमाग और चरित्र को मजबूत करती है, शिक्षा समाज में विशेष दर्जा दिलाने में मदद करती है, खुशहाल जीवन जीने के लिए हमें तैयार करती है, अतः प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित बने तथा अपने बेटा और बेटी दोनों को शिक्षित करें, और उन्हें काबिल बनाएं। हम पढेंगे तभी आगे बढ़ेंगे।


प्यारे बच्चों अपने जीवन में लक्ष्य निर्धारित करें। जीवन को दिशा देने के लिए लक्ष्य उतना ही जरूरी है जितना जीने के लिए ऑक्सीजन। विद्यार्थी जीवन चंचलता से युक्त होता है । उस वक्त नए सपने, नए लक्ष्य, नई जिम्मेदारियां हमारे सामने होती है । इस उम्र में भटकाव भी अधिक होता है। इस भटकाव के भी कई कारण हो सकते। कुछ बच्चे गलत लोगो को अपना रोल मॉडल बना लेते हैं। मोबाइल फोन, ऑनलाइन गेम और गेंगस्टर मे व्यस्त हो जाते है। 

जिस समय अपने आने वाले जीवन को नई दिशा देने का समय था, सही दिशा मे प्रयास करने का समय होता है, उस समय ये अपना कीमती समय बरबाद करते है। जिसका खामियाजा उनके परिवार, बच्चों और आने वाली पीढ़ी को भुगतना पडता है।

भटकाव होने से कई बार ऐसा होता है कि हम अपने सपनों को पूरा करने के लिए लगातार मेहनत करते हैं। मेहनत करने के बाद भी हमें सफलता नहीं मिलती है तो हम निराश हो जाते हैं। लेकिन हमें कभी निराश नहीं होना चाहिए बल्कि ऐसे समय पर आपको एक बार सिर्फ पूरी ताकत के साथ प्रयास शुरू करना चाहिए। मैंने ऐसा महसूस किया है कि सही मार्गदर्शन नहीं मिलने और सही समय पर सही कार्य न करने से हम लक्ष्य से दूर हो जाते हैं। सफलता के मार्ग में भटक जाते हैं । ऐसे समय में हमें सही मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है । नई ऊर्जा उत्साह, प्रेरणा से हमारा जोश, जुनून दोगुना हो जाता है । अत: हमे एकाग्रचित होकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जुटना चाहिए।


प्यारे बच्चों जब तक आप अपने अंदर जोश, जुनून, विश्वास के साथ मेहनत करने के लिए धैर्य के साथ तत्पर रहेंगे तो आप दुनिया में हर वो मुकाम हासिल कर सकते हैं जो आप पाना चाहते हैं। दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यता अनुसार ही चमकता है, इच्छा अनुसार नहीं । अतः इच्छा को योग्यता में बदलना सीखिए।

 विद्यार्थी अपने जीवन मे  बचपन से ही ऐसी छोटी-छोटी आदतें डाले ।यह छोटी-छोटी आदते ही हमारे जीवन में बड़ा फर्क पैदा करती है । अपने जीवन मे दिल और दिमाग से सोचकर एक लक्ष्य निर्धारित करें। और उसे पाने के लिए छोटी-छोटी आदतें विकसित करें। लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कदम दर कदम आगे बढ़े । अपने में योग्यता विकसित करें। अपनी गलतियों को स्वीकार करना सीखिए। क्या गलती कर रहे हैं उसका विश्लेषण करें । उन्हें दूर करने का प्रयास करें । सफलता का एक मूल मंत्र यह भी है कि आप अपनी गलतियों के साथ-साथ दूसरों की गलतियों से भी सीखे । अगर खुद गलतियां करके सीखोगे तो जिंदगी छोटी पड़ जाए । अपने शिक्षक खुद बने । क्योंकि हम अपने आप को जितना जान सकते हैं दूसरा उतना नहीं जान सकता। अपने शिक्षक बनकर स्वयं को शिक्षा दीजिए । अपने आप को सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए जी जान लगा कर प्रयास करें। दूसरों के विचारों और कुतर्कों से प्रभावित न हो। कुछ करके दिखाना है तो नींद चैन को त्यागों। आप जितना सोचते हो, कोशिशें उससे ज्यादा करो। सपने देखो लक्ष्य बनाओ। इतनी मेहनत करो कि पढ़ाई के आगे हर चीज फीकी लगने लगे। रात को नींद ना आए, सुबह नींद से उठ कर पढ़ने लगो, सुबह के नाश्ते, रात के खाने की फिकर न रहे, यह अनजान किताबे तुम्हें अपनी दोस्त लगने लगे तब समझो कि लक्ष्य को पाने के लिए तैयार हो गए हो।

एक बार खुद पर विश्वास रखकर अपने सपनों को पूरा करने के लिए मन में जुनून रुपी आग लेकर पूरी शक्ति के साथ प्रयास शुरु कर दो ।

कामयाबी आपके कदम चूमेगी। तब समझना कि तुम्हारा समय आने वाला है और तुम्हारे पीछे यह जमाना चलने वाला है। सपने देखो, उन्हे पाने की कोशिश करो, उस मुकाम तक पहुंचो, अपने आपको इतना योग्य बनाओ कि तुम्हारे जैसा बनना भी किसी का सपना बन जाए।

डॉ. अरुणा गुर्जर

व्याख्याता, भीलवाड़ा 

बगड़ावत गाथा की महत्ता

 बगड़ावत गाथा की महत्ता






सहणी सबरी हूं सखी, दो उर उल्टी दाह।

दूध लजाणौं पूत सम, बलय लजाणौ नाह।।


राजस्थान की वीर मरभूमि पर अनेक वीर और विरांगनाए हुई है । इन्होंने अपने अमर कृत्यों से इतिहास में विशिष्ट पहचान बनाई । राजस्थान की वीर मरुधरा का कण-कण इनकी गाथा सुनाते हुए अनुभूत होता है ।कर्नल टाॅड तो ने कहा - राजस्थान में ऐसी कोई जगह नहीं है जहां थर्मोपल्ली जैसी रणभूमि न हो और नहीं कोई ऐसा नगर हुआ जहां लियोनीडास जैसा वीर पुत्र उत्पन्न ना हुआ हो।

राजस्थान की धरा पर शक्ति भक्ति और नीति की त्रिवेणी प्रवाहित हुई है।

राजस्थान की वीर गाथा में बगडावत लोक गाथा का विशिष्ट स्थान है । यह एक मौखिक श्रुत परंपरा है। भगवान देवनारायण की  गाथा का वाचन भोपा द्वारा जंतर वाद्ययंत्र के साथ किया जाता है। सर्वप्रथम मंगला चरण के रूप में गणेश सरस्वती की आराधना की जाती है और सरस्वती को याद करते हुए बगडावत लोक गाथा का वाचन किया जाता है। इस गाथा मे नवी से दशवी शताब्दी के बीच का वर्णन है।



बगडावत गाथा को फड़ के माध्यम से वाचन किया जाता है । यह राजस्थान की  सभी फड़ो से प्राचीन और लंबी है । बगडावत गाथा की फड़ का आकार डेड मीटर गुणा साढे आठ मीटर होता है । यह सफेद कपड़े पर पारंपरिक रंगों से निर्मित होती है ।यह फड़ एक चित्रपट्टिका है जिसमें गाथा से संबंधित विभिन्न पात्रों दृश्योंं  का चित्रण होता है । पारम्परिक रूप से चित्र समूहों के रूप मे गाथा के विभिन्न हिस्सों को उकेरा जाता है।  गाथा वाचन के समय यह फड़ चित्रित पार्श्व पर्दे का होना आवश्यक है ।यह फड़ संपूर्ण कथा को अपने में संजोए हुए हैं ।फड़ो का  वाचन एक विशिष्ट शैली में होता है। इसमें चित्र, संगीत और वार्ता का मेल होता है। लोकप्रिय भोपा द्वारा ओज रूप  से मनोरंजक तरीके से फड़ का वाचन किया जाता है ।


भगवान श्री देवनारायण की गाथा अति विशाल है। 

मेवाड़ की धरा पर हरिराम के वंशज बाघराव से यह कथा आरम्भ होती हैं । दयावीर दानवीर और साहसी बाघराव के चौबीस पुत्र ही बगड़ावत कहलाते हैं अपनी मातृभूमि की आन बान शान की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा कर यह 24 बगडावत इतिहास में अमर हो जाते हैं। जयमति की मानवीय भावना का आदर करते हुए उसे अपना उचित स्थान दिलाते हैं ।


बगडावत शिव भक्त थे। बौद्धिक चतुराई व कुशलता से इन्हें एक स्वर्ण पोरसा, अकूट खजाना, बंवली घोड़ी, जयमंगला हाथी,चन्द्रसी खाण्डा के साथ बारह वर्ष की काया और बारह वर्ष की माया का वरदान मिला।

 शिव से मिला स्वर्ण पोरसा  अद्भुत विशेषताओं  से युक्त था। उसे जितना खर्च करते वह उतना ही बढ़ता जाता। बगड़ावतो ने अपने वरदान में मिले धन को जनहित कार्य में लगाया ।जगह जगह चारागाह, धर्मशाला, बावड़िया तालाब खुदवाए। वृक्ष लगवाए तथा लाखों की तादाद में  पशुओं का दान किया।


एक नारी के मान सम्मान के लिए उन्होंने अपने धर्म भाई राणा दुर्जन साल से युद्ध किया ।युद्ध में वीरता के साथ अपने प्राणों की आहुति दी । खारी नदी के तट पर भयंकर युद्ध हुआ जिसमे सभी बगड़ावत और राणा राजा दुर्जनसाल के सभी योद्धा खेत रहे। अपने वंश की प्रतिष्ठा और धर्म के के लिए माता साडू की गोद में संवत 968 को भगवान श्री देवनारायण का जन्म हुआ। इन्हें विष्णु का अवतार माना जाता है। देवनारायण को पांच नाम से जाना जाता है देवजी उदाजी कृष्णा धर्मराज  नारायण।

 देवनारायण के जन्म के बाद माता साडू प्राण राजा दुर्जनसाल के अत्याचारों से बचाने हेतु अपने नवजात पुत्र को लेकर अपने पीहर मालवा  ले जाती है। वहां अपने पुत्र को युद्ध कौशल की शिक्षा दिलवाई । छोछू भाट के आगमन पर देवनारायण को अपने पूर्वजों का ज्ञान होता है।  अपनी सेना इकट्ठी पर अपने बिछड़े चार भाइयों को एकत्र करके राजा दुर्जन साल पर आक्रमण करते हैं। राजा दुर्जन साल  के अत्याचारों से  जनता को मुक्त करवाते है ।आयुर्वेद की विविध औषधियों से जनता की शारीरिक पीड़ा  को समाप्त करते हैं । अनेक जन मंगलकारी कार्य करते हुए बैशाख सुदी अक्षय तृतीया संवत् 999 को धाम वैकुंठ में पधारते हैं।


राजस्थानी लोक संस्कृति, साहित्य की परम्परा में लोकगाथाओ की समृद्ध परंपरा रही है। बगड़ावत लोक गाथा में हमें वीरता, त्याग,दया, प्रेम, रोमांच की शिक्षा मिलती है ।यह गाथा सबसे बड़ी गाथा के रूप में उभरकर सामने आती है। फड़वाचन में भोपा द्वारा नृत्य संगीत लय वादन का मनोरंजक रूप में  वाचन किया जाता है। भगवान देवनारायण से अपनी इच्छा पूर्ति हेतु पात्ती मांगी जाती है। मन की इच्छा पूर्ण होने पर  इनकी गाथा का वाचन करवाया जाता है । यह गाथा हमें आदर्श, वचन निर्वाह त्याग  इत्यादि गुणों की शिक्षा देती है । सभी गाथा में बगड़ावत कथा विशिष्ट महत्ता है।

वीरो की मरुधरा पर बज रही है हुंकार ।

जंतर संग बगड़ावत की बज रही है झंकार।।


नाहर नृत्य


 अजमेर के चौहान साम्राज्य में एक खूंखार शेर का आतंक था। जो प्रतिदिन कई जानवरों और व्यक्तियों का शिकार करता था। राजा बीसलदेव ने यह मुनादी करवा दी कि जो इस शेर को मारकर दरबार में पेश करेगा उसे मुंहमांगा वरदान दिया जाएगा। हरिसिंह गुर्जर ने अपनी तलवार के एक ही झटके से बाघ की गर्दन काट दी तथा राजा को साक्षी देने हेतु अपने एक हाथ में रक्त रंजित तलवार और दूसरे हाथ में शेर का मुख लेकर बीसलदेव के पास जाने लगे। पुष्कर के पास रास्ते में एक बावड़ी थी । जहां संन्यासी लीला सेवंती शापवश आराधना करती थी। वह सूर्योदय से पूर्व किसी भी पुरुष का मुंह नहीं देखती थी। उसे यह शाप था की वह जिस पुरुष का मुख देखेगी वैसा ही पुत्र प्राप्त हो जाएगा । संन्यासी होने के कारण उसने विवाह नहीं किया था। संयोगवश हरिसिंह अपनी प्यास बुझाने हेतु बावड़ी की तरफ बढ़ता है। बाघ का कटा हुआ सिर और रक्त रंजित तलवार लेकर बावड़ी में प्रवेश करता है। वह चांदनी रात में बावड़ी के अंदर पहुंचता है और तलवार को एक तरफ रख कर बाघ के मुंह को एक हाथ में पकड़े दूसरे हाथ से पानी पीने लगता है । पानी पीने की आवाज आने पर लीला सेवंती का ध्यान भंग होता है और उसकी नजर हरिसिंह को पानी पीते हुए पर पड़ती है। उसे बाघ का मुख और इंसान का शरीर दिखाई देता है। वह यह दृश्य देखकर डर जाती है। उन्हें बावड़ी से चले जाने की आज्ञा देती है। हरिसिंह इतनी रात बावड़ी मे स्त्री की आवाज सुन अचंभित होते है और हाथ जोड़कर प्रार्थना करते है कि वह पानी पीने आये है। अगर मुझसे कोई अपराध हुआ तो मुझे क्षमा करें। लीला सेवंती हरिसिंह की उदारता और विनम्रता को देखकर मोहित हो जाती है । शाप मुक्ति को वरदान समझ उन्हें इस प्रकार आने का प्रयोजन पूछती है। हरिसिंह बाघ को मारने की और राजा के समक्ष प्रस्तुत करने की सारी घटना सुना देते है। लीला सेवंती अपने शाप मुक्ति हेतु योग साधना के बारे मे बताती है। हरिसिंह को कहती है कि राजा जब आपको खुश होकर कुछ मांगने के लिए कहे तब आप मेरा हाथ उनसे मांग लीजिए। मैं आपको पति रूप में स्वीकार करना चाहती हूं। हरि सिंह प्रसन्न होकर वहां से विदा होता है और राज दरबार पहुंच जाते है। खूंखार शेर के आतंक से मुक्ति पाकर राजा बहुत प्रसन्न होते हैं और उन्हें रियासत दान देते हैं। कई हाथी, घोड़े, मोहरे प्रदान करते हैं और साथ ही लीला सेवंती का विवाह धूमधाम से कर देते हैं। दोनों विवाह पश्चात बदनोर रियासत का निर्माण करते हैं और सुख पूर्वक रहने लगते हैं । कुछ माह पश्चात लीला सेवंती एक पुत्र को जन्म देती है। वह पुत्र अनुठे शरीर वाला होता है। जिसका मुख सिंह जैसा शरीर इंसान जैसा होता है। ऐसे अजीबोगरीब पुत्र को पाकर दोनो डर जाते हैं और उसे जंगल में छोड़ आते हैं। लेकिन उसकी चिन्ता सदैव मन मे रहती है। कहावत है जाको राखे साईया मार सके ना कोई। जंगल मे रोते हुए की आवाज सुनकर शेरनी पास आती है। बालक कुछ दिन शेरनी का दूध पीकर जीवित रहता हैं। एक दिन कुछ व्यक्ति जंगल से गुजरते है।वहाँ उन्हें वह बालक शेरनी के पास खेलता हुआ मिलता है। लोगो को देखकर शेरनी दूर चली जाती है। वे रोते हुए छोटे बालक को लाकर राजा को सुपुर्द कर देते हैं। राजा हरि सिंह को बुलाकर सुपुर्द करता है कि आप इस विचित्र बालक की देखभाल करें और उसकी रक्षा करें। हरिसिंह अपने पुत्र को वापस पाकर बहुत प्रसन्न होते है और ईश्वर की इच्छा मानकर पुत्र का पालन पोषण करते हैं । बाघ अथार्त नाहर(शेर) जैसा मुख होने के कारण उनका नाम बाघ रखा जाता है। बचपन से ही वीर साहसी और पराक्रमी होता है। बलिष्ठ शरीर और रौद्र मुख के कारण सब उनसे डरते थे। राजा को सहयोग मिलने के कारण उन्होंने राव की उपाधि प्रदान की। तब से बाघराव के नाम से जाने जाते है। बाघराव वीर होने के साथ साथ विनम्र भी थे। राजा की सीमा और बाग बगीचो की देखरेख करते थे। उनके डर से पशु पक्षी भी नुकसान नहीं करते। होली के उत्सव पर उत्सुकता से भाग लेते और बगीचो मे अपनी क्रिडाए करते। 

उन्हीं की याद में पूरे गांव में नृत्य और उत्सव का आयोजन किया जाता है। उस समय सभी बालक बाघ का सांग धर कर उनके साथ नृत्य करते और उत्सव मनाते। यही परम्परा आज भी चालू है। आज भी माण्डल मे उनकी स्मृति रूप मे नाहर नृत्य किया जाता है। सभी नृतक सफेद रूई से शरीर को ढककर नाहर अथार्त शेर का स्वांग धरते है । उल्लास और उमंग के साथ नृत्य करते है और गैरिये गैर खेलते है।

अन्तरराष्ट्रीय तीर्थस्थल सवाईभोज मन्दिर आसींद का इतिहास

 सवाईभोज मंदिर का इतिहास:-








 राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के आसींद तहसील की पूर्व दिशा में 2 किलोमीटर दूर स्थित ऐतिहासिक स्थल सवाई भोज मंदिर गुर्जर समाज का अंतरराष्ट्रीय तीर्थ स्थल है। नवीं- दसवी शताब्दी की प्रसिद्ध बगड़ावत गाथा जुड़ी हुई है। हरिराम गुर्जर के पुत्र बाघ राव हुआ। जिनका मुख बाघ के समान और शरीर इंसानों जैसा था। इसलिए उनका नाम बाघ राव पड़ा। हष्ट-पुष्ट और वीरता से युक्त बाघ राव के बारह पत्नियां थी। सभी पत्नियों के दो-दो पुत्र हुए । कुल चौबीस पुत्र बगड़ावत के नाम से प्रसिद्ध हुए। सभी सर्वगुण संपन्न और धर्म प्रिय थे। दान पुण्य और जनहित कार्यों में लगे रहते थे।भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। उनके आशीर्वाद से उन्हें नाग पहाड़ पर स्वर्ण पोरसा, बंवली घोड़ी चंद्रासी खांडा और जयमंगला हाथी प्राप्त हुआ था। साथ ही बारह वर्ष की काया और बारह वर्ष की माया का वरदान प्राप्त हुआ। स्वर्ण पोरसे की यह विशेषता थी कि उसे जितना काटो उतना ही वह बढ़ जाता था। सभी भाई वरदान से प्राप्त संपदा को गरीब,असहाय लोगों में बांट देते। उन्होंने कई तालाब बावड़िया, धर्मशालाएं बनवाई, वृक्षारोपण किया। जिनके प्रमाण आज भी मेवाड़ मे देखे जा सकते हैं। यहां कई प्राचीन तालाब हैं जो उनकी गाथा को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करते हैं। चौबीस भाइयों ने अपने नाम से चौबीस खेड़े बसाये। बाघराव के पुत्र सवाई भोज और माता साडू को भगवान विष्णु ने पुत्र रूप में जन्म लेने का वचन दिया। वचन पालनार्थ संवत 968 माघ सुदी सप्तमी को मालासेरी की डूंगरी पर देवनारायण का जन्म हुआ। अपने अलौकिक कार्यों से लोगों के कष्ट हरे ।  राजधानी गोठा, आसींद, मालासेरी, बदनोर, खेडा चौंसला, देवमाली, देव डूंगरी, जोधपुरिया,भिनाय से लेकर मालवा तक की धरती पर उन्होंने अपना परचा दिया।

वर्तमान में प्राचीन सवाई भोज मंदिर की धरती पर सवाई भोज की धड़ की स्वत: उद्भवित मूर्ति है जिसके छाती पर आंखें हैं। यहां चौबीस भाइयों की याद में चौबीस खंभों की छतरी बनी हुई थी ।यह छतरी ग्रेनाइट के पत्थरों से निर्मित थी। कालांतर में दीवार बनाकर प्राचीन मंदिर का निर्माण करवाया गया। प्राचीन मंदिर दसवीं शताब्दी मे निर्मित है। धीरे-धीरे इस मंदिर का विकास प्रारंभ हुआ। निरंतर प्रयास व विकास से वर्तमान सवाई भोज मंदिर एक भव्य, विशाल, सुंदर व आकर्षक मंदिर बन चुका है। श्री सवाई भोज मंदिर के अलावा यहां श्री देवनारायण का मंदिर, श्री माता साडू का मंदिर, भुणा जी का मंदिर ,पांचों भाइयों का मंदिर, रानी जयमती का मंदिर, शिव का मंदिर, नौ देवी देवताओं के मंदिर स्थित है ।

सवाईभोज प्रांगण में बने भुणा जी के मंदिर का निर्माण महाराजा भीम सिंह के काल में हुआ। तत्कालिक पुजारी जग्गा जी चेला रत्ना जी द्वारा संवत 1853 माघ सुदी पंचमी को इस मंदिर का कार्य पूर्ण करवाया गया। नियाजी के मंदिर का निर्माण महंत भैरू दास जी के समय में संवत 1916 में खमाण सिंह जी के समय किया गया। श्री सवाई भोज मंदिर के पास तीन खंड का नगार खाना था । इसका निर्माण बाघ दास जी द्वारा करवाया गया। परंपरा अनुसार जब कोई आपातकालीन स्थिति होती तब नगाड़ा बजा -बजाकर लोगों को जानकारी दी जाती थी । पुजारी देवा दास जी के समय बादल महल का निर्माण करवाया गया। सवाईभोज स्थल पर पूजा करने के लिए गुर्जरों की तेड़वा गोत्र का पुजारी या महंत नियुक्त करने की परंपरा रही है। पुजारियों के निवास हेतु इंद्रपोल के पास ही केलु के छपरे का निर्माण करवाया गया। वहीं रहकर सभी पुजारी सवाई भोज मंदिर की पूजा अर्चना करते थे। पुजारी देवदास के बाद  प्रेमदास जी पुजारी बने। प्रेमदास जी की हत्या सन 1980 में हो गई। अनायास घटित इस घटना से उत्तराधिकारियों का चयन नहीं हो पाया । सवाई भोज मंदिर की भूमि जागीरदारी प्रथा के अनुसार मापी की जमीन सरकार द्वारा रिज्यूम करने की नौबत आ गई। इस समय सरकार द्वारा मंदिर के पुजारियों के नाम राजस्व रिकॉर्ड से हटाने का निर्णय हुआ । सवाईभोज स्थल की जमीन सरकार के पास चली जाने की नौबत आई। इसी समय देवस्थान विभाग उदयपुर के यहां वर्तमान सवाई भोज मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री लक्ष्मी लाल गुर्जर ने सवाई भोज एवं देवनारायण मंदिर ट्रस्ट का रजिस्ट्रेशन करवाया जो देवस्थान विभाग उदयपुर मे रजिस्टर्ड नंबर 2/81/22-5-1981 के क्रमांक पर रजिस्टर्ड है। प्रक्रिया में काफी प्रयास के बाद मंदिर ट्रस्ट बनने से सवाईभोज स्थल के विकास की श्रृंखला शुरू हुई। इसे ट्रस्ट के रजिस्ट्रेशन के बाद मंदिर पर लगी रिसीवरी को समाप्त करने का श्रेय गुर्जरों के गांधी श्री लक्ष्मी लाल जी को जाता है। अपने कर्मठ, सेवाभावी, ईमानदार, विनम्र व्यक्तित्व के धनी श्री लक्ष्मी लाल जी गुर्जर ने इस स्थल को संरक्षित करने और इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में अपना योगदान दिया। ट्रस्ट निर्माण के बाद पुजारी को महंत की पदवी दी गई। उत्तराधिकारियों के लिए वंश परंपरा ना होकर तेड़वा गोत्र के व्यक्तियों को ही महंत नियुक्त किया जाता है। प्रेमदास जी के बाद मोतीदास जी को महंत नियुक्त किया गया। उनके देवलोक गमन के बाद श्री भूदेव दास जी को सवाईभोज महंत नियुक्त किया गया । महंत भूदेवदास जी के बाद महंत सुरेश दास जी को नियुक्त किया गया। इस स्थान की एक विशिष्ट परंपरा है कि यहां नियुक्त ट्रस्ट अध्यक्ष व सदस्यों को निशुल्क सेवा देनी होती है। बिना पारिश्रमिक के सभी मंदिर में भगवान की सेवा करते हैं।

गुर्जर समाज के प्रेरणास्रोत : श्री लक्ष्मी लाल गुर्जर

 गुर्जर समाज के प्रेरणास्रोत : श्री लक्ष्मी लाल गुर्जर 

 लक्ष्मी लाल जी और अण्छी देवी दोनो मध्य में तथा गोदी मे प्रीता और पास मे गीता 

जन्म :- 11 अक्टूबर 1931

जन्मस्थान:- झरडू का खेडा, सबलसागर, बदनोर, भीलवाड़ा, राजस्थान। 

माता:-कशनी बाई

पिता:-श्री जयराम गुर्जर 

पत्नी:-श्रीमती अण्छी देवी

संतान:- 

पुत्र- 

1.राजेंद्र गुर्जर 

2.विष्णु गुर्जर 

3.गोपाल गुर्जर 

पुत्रिया-

1.गीता गुर्जर 

2.प्रीता गुर्जर 

3.मधु गुर्जर 

शिक्षा दीक्षा:-

11 अक्टूबर 1931 को कांगस परिवार में जयराम जी गुर्जर के साधारण किसान परिवार में श्री लक्ष्मी लाल जी का जन्म हुआ। एक साधारण गरीब परिवार में जन्म लेकर उच्च शिक्षा प्राप्ति तक कठिन परिश्रम किया। बचपन से ही समाज को आगे बढ़ाने के सपने को पूरा करने के लिए शिक्षा की डोर थामी। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने पर भी पढ़ाई की सच्ची लगन के साथ आगे बढ़ते रहे। रियासत काल में शिक्षा की सुविधा नहीं होने के कारण मिडिल बोर्ड की पढ़ाई बदनोर ठिकाने के विद्यालय से प्राप्त की। हाई स्कूल अध्ययन हेतु 27 किलोमीटर दूर भीम के स्कूल में प्रवेश लिया। प्रतिदिन पैदल यात्रा कर पढ़ाई की और अच्छे अंको से उत्तीर्ण किया। बचपन से ही मेधावी, कठिन परिश्रमी श्री लक्ष्मी लाल जी की इच्छा उच्च शिक्षा प्राप्त कर राजकीय सेवा के साथ-साथ समाज सेवा करने की रही। जीवन मे आर्थिक रूप से कई कठिन परिस्थितियां आने पर भी विद्याध्ययन की सच्ची लगन के कारण वह निरंतर शिक्षा की ओर प्रयासरत रहे। पत्नी अण्छी देवी ने पारिवारिक जिम्मेदारियो को बखूबी निभाया। अनपढ़ होते हुए भी उन्होंने कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया और सदैव प्रेरित करती रही। उपकी प्रेरणा से उच्च शिक्षा की प्राप्ति हेतु त्रिभुवन विश्वविद्यालय नेपाल से स्नातक उत्तीर्ण किया । अजमेर राजकीय महाविद्यालय से एल.एल.बी की डिग्री प्राप्त की । राजकीय सेवा में रहते हुए भी स्वयंपाठी विद्यार्थी के रूप में आगे भी अध्ययन जारी रखा। राजकीय सेवा में रहते हुए सभी डिग्रियां प्राप्त करना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

व्यावसायिक जानकारी:-

राजकीय सेवा 1954 से 1976 तक, वकालत 1976 से निरन्तर। राजकीय सेवा में समाज शिक्षा प्रसार अधिकारी, जिला स्तरीय पंचायत प्रसार अधिकारी, राजस्थान गुर्जर महासभा अध्यक्ष 1982 से।

सदस्य, राजस्थान विधानसभा की पुस्तकालय समिति 1990-92, सदस्य कृषि, भेड़, ऊन, मत्स्य, वफ्फ, सैनिक कल्याण विभाग की संसदीय परामर्श दात्री समिति 1991

पारिवारिक जानकारी:- 

      श्री लक्ष्मी लाल जी गुर्जर के तीन पुत्र और तीन पुत्रियां हैं। उन्होंने सभी को उच्च शिक्षा प्रदान करवाई । उनके परिवार में सभी शिक्षित है । बड़ा पुत्र राजेंद्र गुर्जर है । द्वितीय पुत्र विष्णु गुर्जर एल.एल.बी स्नातक तृतीय पुत्र गोपाल गुर्जर एल.एल.बी स्नातक, नोटरी पब्लिक है। तीनों पुत्रियां राजकीय सेवा में शिक्षिका पद पर कार्यरत हैं तथा उनके परिवार में बच्चों सहित तीन वकील तथा 6 अध्यापिका है तथा अगली पीढ़ी के सभी बच्चे उच्च शिक्षार्जन कर रहे हैं।

























        विनम्र, कर्मठ, सेवाभावी, ईमानदार, सादगी युक्त सहज सरल व्यक्तित्व के धनी श्री लक्ष्मी लाल जी गुर्जर ने समाज के विकास में भागीदारी निभाई। गांधीवादी विचारो से प्रेरित श्री गुर्जर ने अपना पूर्ण जीवन समाज के लिए समर्पित कर दिया। समाज के उत्थान हेतु राजनीति में प्रवेश लिया। राजस्थान गुर्जर महासभा के 1982 में निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए ।  

       गुर्जरों के गांधी माने जाने वाले श्री लक्ष्मी लाल जी गुर्जर ने अपना संपूर्ण जीवन समाज की जागृति का विकास के लिए अर्पित कर दिया । उन्होंने गुर्जर समाज में जागृति लाने, सामाजिक रूढ़ियों को त्यागने, बालिका शिक्षा के उच्चतम प्रयास के साथ-साथ अन्य विषयों पर भी सार्थक पहल की। गुर्जर समाज सुधार कमेटिया बनवाकर समाज मे फैली बुराईयो को दूर करने हेतु कई सभाए की और लोगो को कुरीतियो को त्यागने का प्रण दिलवाया। शिक्षा के लिए प्रेरित किया। जिससे अत्यधिक पिछड़े माने जाने वाले समाज मे भी बदलाव स्पष्ट दिखने लगा है।

      पेशे से वकील श्री गुर्जर के सानिध्य वह संरक्षण से ही सवाईभोज स्थल आसींद मे ट्रस्ट का निर्माण हुआ जो देवस्थान विभाग उदयपुर में रजिस्टर्ड है। सवाई भोज मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष होने के नाते उन्होंने इस मंदिर का चहुँमुखी विकास कर उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। वे पिछले 60 वर्षों से सवाई भोज मंदिर की प्रगति व विकास के लिए संघर्ष कर रहे है और उनका जीवन समाज और देवनारायण भगवान की सेवा के लिए समर्पित है। उन्होंने अलग अलग स्थान के  निवासी समाज के लोगों द्वारा प्राप्त आर्थिक सहयोग से छात्रावास का निर्माण करवाया। सवाई भोज मंदिर के निर्माण व विकास का यह पहला कदम था। इसी संदर्भ में स्वर्गीय श्री राजेश पायलट, श्री गोविंद सिंह गुर्जर, राजस्थान व भारत के विभिन्न गुर्जर महासभा के अध्यक्ष इत्यादि का ध्यान इस स्थल की ओर आकर्षित करवाया। अपने प्रयास व सभी के सहयोग से सवाईभोज स्थल निरंतर विकास कर रहा है । सवाई भोज मंदिर के ताम्रपत्र अनुसार प्राप्त जमीन को संरक्षित किया । आप ही के प्रयास से सर्वोच्च स्तर की जमीन मंदिर के नाम रजिस्टर्ड हुई। सवाई भोज की मापी की जमीन सवाईभोज बनी, प्रतापपुरा मंदिर की जमीन, बगड़ावत सवाई भोज की जमीन , सभी को ट्रस्ट की देखरेख में लेकर सवाई भोज मंदिर के निर्माण व विकास का सपना साकार किया ।

        श्री बीला बाबा एवं टोंक जिले के महानुभाव,अन्य के सहयोग से तीन खण्ड मे सवाई भोज मंदिर के नए मंदिर का निर्माण करवाया। भगवान श्री देवनारायण, श्री सवाई भोज, श्री माता साडू,नौ देवी देवताओं की मूर्ति स्थापना करवा कर प्राण प्रतिष्ठा करवाई। यात्रियों की सुविधा के लिए सराये बनवाई। मंदिर प्रगति के लिए हर संभव कोशिश। इसी संदर्भ में ट्रस्ट की आय के लिए श्री सवाई भोज एवं देवनारायण फिलिंग स्टेशन आसींद की स्थापना करवाई।



      भारतवर्ष में श्री सवाई भोज का प्रसिद्ध मंदिर आसींद भीलवाड़ा,राजस्थान में स्थित हैं। इस मंदिर की मापी की  विशालता को देखते हुए इसके विकास व प्रगति की बहुत गुंजाइश है। श्री गुर्जर का सपना है कि सवाई भोज मंदिर टूरिज्म डिपार्टमेंट में शामिल हो। यह स्थल देशी विदेशी पर्यटकों के लिए पर्यटन स्थल बने। मंदिर की व्यवस्थाओं को ठीक करने के लिए वित्तीय साधनों के अनुसार प्रयासरत है। उसी के अनुरूप मास्टर प्लान बना कर अध्यक्ष जी विकास के लिए कृत संकल्प है । उन्होंने विकास संबंधी सभी योजनाओं को समय-समय पर लागू किया । उनका प्रयास है कि संचार साधनों के द्वारा इस स्थल की जानकारी सभी तक पहुंचे।

     उनका विनम्र समर्पण, सेवा-भाव ईमानदारी, सादगी सभी के लिए एक आदर्श है।  उनकी इच्छा है कि गुर्जर समाज अन्य सभ्य समाज की तरह सभ्य व शिक्षित बने। सभी सामाजिक कुरीतियो को त्यागकर आर्थिक और मानसिक उन्नति करे। सवाईभोज मंदिर विकास हेतु 60 वर्ष से निरन्तर निःशुल्क सेवा कर रहे है।उनका सपना है कि समाज के दानदाताओं के सहयोग से सवाईभोज स्थल का चहुँमुखी विकास हो और यह स्थल हिंदुस्तान के गुर्जर समाज का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छी पहचान बनाए।

शिक्षा और समाज

 शिक्षा और समाज 


जरुरी नहीं कि रोशनी चिरागो से ही हो...

शिक्षा से भी घर रोशन होते हैं...



            गुर्जर समाज के सभी प्रिय महानुभावों को मेरा सादर प्रणाम! आज मैं महत्वपूर्ण विषय पर आपके समक्ष कुछ प्रश्न  रख रही हूं जो गुर्जर समाज के लिए अति आवश्यक है। कुछ ऐसे प्रश्न है जो मन को उद्वेलित करते रहते हैं उन प्रश्नों को मैं आप सब के समक्ष रखती हूं 

पहला प्रश्न- गुर्जर समाज अन्य समाज से पिछड़ा हुआ क्यों है ? 

दूसरा प्रश्न - क्या शिक्षा प्राप्त कर लेने का मतलब केवल अक्षर ज्ञान प्राप्त करना है ?

तीसरा प्रश्न- शिक्षा को हम किन नजरियों से देखते हैं? 

चौथा प्रश्न -शिक्षा को अपने जीवन में कैसे अपनाते हैं?

पांचवा प्रश्न -शिक्षा द्वारा कितना ज्ञान ग्रहण कर पाते है? 

छठा प्रश्न -बुद्धिजीवी वर्ग सामाजहित कार्य से दूर क्यों हो जाते हैं?

यह सभी प्रश्न हमारी सामाजिक व्यवस्था और बदलाव तथा उन्नति के रूप में मन को उद्वेलित करते हैं की आखिर इन प्रश्नों का क्या जवाब हो सकता है और कहां हम चूक कर रहे हैं की इतना बड़ा समाज और योग्य जनों के होते हुए भी हमारे समाज में वह बदलाव नहीं आया है जिसकी हम आशाएं और अपेक्षाएं रखते हैं। सामाजिक विकास हेतु मेरे अपने निजी विचार कुछ इस प्रकार है-

समाज के बिना मनुष्य पशु समान है । समाज से ही व्यक्ति का महत्व है अतः समाज हित में ही व्यक्ति का हित निहित है। प्रत्येक व्यक्ति समाज में ही पल्लवित और पुष्पित होकर अपना जीवन यापन करता है समाज से ही उसकी महत्ता बढ़ती है। समाज में ही उसकी जीवन लीला समाप्त हो जाती है। ऐसी स्थिति में शिक्षा का महत्वपूर्ण दायित्व हो जाता है कि बालकों में सामाजिक भावना जागृत करें । उनमें दया, परोपकार, सहनशीलता, सौहार्द, सहानुभूति, अनुशासन इत्यादि सामाजिक गुणों का विकास करें। व्यक्ति को अपने समाज को उन्नत बनाने का हर संभव प्रयास करना चाहिए ।

आज के युग में मनुष्य का शिक्षा प्राप्त करना अति आवश्यक है। शिक्षा का मतलब अधिकांशत स्कूली शिक्षा से लेते हैं लेकिन मेरा मानना है की केवल अक्षर ज्ञान प्राप्त करना हमारा उद्देश्य नहीं होना चाहिए ।अधिकतर शिक्षा के नाम पर अक्षर ज्ञान प्राप्त करते हैं लेकिन उन अक्षरों का ,शब्दों का, कहां और कितना प्रयोग करना चाहिए इसका ध्यान नहीं रखते इस मर्यादा को भूल जाते हैं। शिक्षा का उद्देश्य अपने शारीरिक और मानसिक विकास के साथ-साथ शाब्दिक कौशल को विकसित करना, मानवता का पालन करना, नैतिक नियमों का पालन करना ,धर्म व मर्यादा का पालन करना ही असली शिक्षा है

वह जीवन ही क्या जीवन है जो काम देश के आ न सका  अर्थात्  ऐसा जीवन यापन करना चाहिए जो देश और समाज के लिए मिसाल बने। प्रत्येक समाज की सभ्यता और संस्कृति तथा उन्नति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होती है यदि वर्तमान पीढ़ी अपने शिक्षा का दुरुपयोग करेगी या सही शिक्षा प्राप्त नहीं करेगी तो वह अगली पीढ़ी को प्रेषित होगा और समाज का बदलना मुश्किल हो जाएगा अतः हमें व्यक्तित्व विकास, उन्नति, नैतिक मूल्य, माननीय गुण, चारित्रिकता पर ध्यान देना होगा सामाजिक कुरीतियों को दूर करना होगा । यही अगली पीढ़ी तक जाएगा और समाज में बदलाव की एक नई बयार चलेगी। 



वॉल्मार्ट के अनुसार- शिक्षा जीवन की तैयारी है।

बहुत जरूरी होती शिक्षा, सारे अवगुण धोती शिक्षा।

 ज्ञान के बहते सागर का, सबसे सुंदर मोती शिक्षा।

 अतः सबसे जरूरी शिक्षा रूपी पतवार है।  समाज को पूर्ण रूप से शिक्षित बनाने के लिए आवश्यक है । शिक्षा द्वारा ईमानदार,परिश्रमी, तथा कर्तव्य को, अपने दायित्व को भली प्रकार से समझने वाले उत्तम नागरिकों का निर्माण करना। समाज को पूर्ण रूप से शिक्षित करने और अन्य सभ्य समाजों के समकक्ष लाने के लिए समाज के ही समस्त शिक्षित वर्ग,अधिकारी ,कर्मचारी, व्यवसाई, उद्यमी आदि को समाज को बदलने का बीड़ा उठाना होगा।

 दुष्यंत कुमार ने कहा है- एक चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों ... इस दिए में तेल से डूबी हुई बाती तो है... समाज सेवा करने का जज्बा सभी बंधुओं के  हृदय में मौजूद है लेकिन कहीं ना कहीं वह सुषुप्त अवस्था में है उसे चिंगारी देनी होगी, आंतरिक भावना को जागृत करना होगा।

 ऐसा माना जाता है कि किसी भी समाज में बदलाव नहीं होने के तीन मुख्य कारण है- 1. गरीब वर्ग में हिम्मत नहीं होती 2. मध्यमवर्ग को फुर्सत नहीं मिलती  3.अमीर वर्ग को इसकी जरूरत नहीं रहती। इसलिए समाज दिनोंदिन पीछे धकेलता जाता है अतः समाज को ऊपर उठाने के लिए या पूर्ण रूप से सभ्य बनाने के लिए हमें अपने आप से शुरुआत करनी होगी।

स्वयं को कमजोर न समझें। हर छोटा बदलाव बड़ी कामयाबी का हिस्सा होता है। इसलिए अपने द्वारा की गई छोटी शुरुआत को कम न समझे, वह एक दिन बड़ा रूप ले लेगी। मंजिल तक चला तब अकेला था... कारवां गुजरता गया ...लोग जुड़ते गए... महफिले सजती रही... और कारवां बढ़ता रहा अर्थात् आप शुरुआत कीजिए धीरे-धीरे लोग आप से जुड़ने लगेंगे और एक दिन आप सम्मानजनक कार्य को पूर्ण कर पाएंगे।

सामने हो मंजिल तो,रास्ता ना मोड़ना।

जो मन में हो वह, ख्वाब ना तोड़ना।

 हर कदम पर, मिलेंगी कामयाबी तुम्हें।

बस सितारे छूने के लिए, कभी जमीं ना छोड़ना।

हम समाज सेवा का जो कार्य करें वह छोटे स्तर पर ही क्यों ना हो पर हमें अपने कर्तव्यों से अपने कर्मों से समाज हित के लिए कार्य करते रहना चाहिए 

एक माटी का दिया है ,जो सारी रात अंधियारे से लड़ता है।

 तू तो भगवान का दिया है, तू किस बात से डरता है। 

हथेली पर रखकर नसीब, तू क्यों अपना मुकद्दर ढूंढता है।

 सीख उस समंदर से जो, टकराने के लिए पत्थर ढूंढता है।

एक दीपक सूर्य के सामने जलता है सूर्य विशाल है और दीपक उसके समक्ष तुच्छ है परंतु फिर भी दीपक जलता है क्योंकि वह अपने अस्तित्व को जिंदा रखता है। अंधियारी रात में पूरी रात जलकर दीपक वातावरण को प्रकाशित करता है। अपने आसपास पहले अंधकार को हरता है जिस प्रकार दीपक अंधकार को हरकर प्रकाशित करता है उसी प्रकार हमें भी अपने जीवन में नेक कार्यों द्वारा दूसरों को प्रकाशित करने का कार्य करना चाहिए अतः दीपक के रूप में अपने आप को कभी छोटा ना समझे जो नेक कार्य आप कर रहे हैं वह सूर्य कि लौ से भी अधिक महत्वपूर्ण है....

डॉ. अरुणा गुर्जर 

देवनारायण की महिमा

 यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।” 


 जब जब भी धरती पर धर्म की हानि आवश्यकता से अधिक होती है निर्दोष लोगों पर अत्याचार होने लगते हैं । हिंसक घटना क्रम होने लगते हैं, अपराधी तत्वों की बढ़ोतरी होने लगती है, मनुष्य में पाप बढ़ने लगता है, तब तब भगवान राक्षसों व आततायियों का संहार करने के लिए धरती पर अवतरित होते हैं ।

भक्तों की रक्षा हेतु, उन्हें सन्मार्ग पर लाने हेतु ,धर्म संकट से उबारने हेतु, भगवान धरती पर अवतरित होते हैं। 




बगडावत द्वारा धर्म का पालन करने पर भी राण के राजा दुर्जन साल द्वारा निर्दोष जनता पर अत्याचार किए गए और नरसंहार किया गया । उनकी त्राहि-त्राहि सुनकर भगवान विष्णु देवनारायण के रूप में धरती पर अवतरित हुए।

विष्णु अवतारी भगवान देवनारायण ने मानव जीवन के धर्म की रक्षा की, अपने वंश की रक्षा की तथा अपने कुल पुरुषों के खोए हुए गौरव को उन्हें पुनः लौटाया।

ग्यारह कला अवतारी भगवान देवनारायण तेजस्वी, शक्तिशाली ,शूरवीर साहसी, क्रांतिकारी थे। अलौकिक कार्यों से युक्त, असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे। जनता के पालक पोषक और रक्षक थे। छोटी उम्र में ही अत्यधिक बुद्धिमान और नीति निपुण थे। दुष्ट को दंड अवश्य देते थे पर हिंसा और खून खराबे से नहीं । उनका दंड देने का तरीका अहिंसा युक्त था। उनका यशस्वी जीवन अद्भुत कौशल और कार्यों का संगम है।

भगवान देवनारायण के जीवन से हमें बहुत सी विशेषताएं और शिक्षाए मिलती हैं । जिन्हें हम जीवन में अनुकरणीय बनाकर अपने मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकते हैं। भगवान देवनारायण गरीब कृषक गुर्जर जाति में उत्पन्न हुए थे। साधारण किसान के रूप में जीवन यापन करते हुए गायों का पालन पोषण किया था। गायों की प्रति प्रेम और निष्ठा अनुकरणीय है । गाय का दूध सुपाच्य और पोषण युक्त होता है। उन्होंने गाय के दूध का महत्व बतलाया। पूजा के लिए गाय का कच्चा दूध ही चढ़ाया जाता है । गाय की  महता बढ़ाई। देवनारायण की पूजा स्थल के लिए गाय के गोबर से लीपकर ही पूजा चौकी का निर्माण किया जाता है। लोगों की शारीरिक और मानसिक व्याधियों को रोकने के लिए  आयुर्वेद पर बल दिया। अनेक बीमारियों का आयुर्वेद के माध्यम से इलाज किया। नीम वृक्ष को नारायण के रूप में पूजवाया। नीम की पत्तियों को प्रसाद के रूप में काम मे लेने पर बल दिया। स्वयं की मूर्ति के स्थान पर मिट्टी की बनी ईंटों की पूजा करने पर बल दिया । इसलिए इन्हें ईंटों का श्याम कहा जाता है। मिट्टी से बने कच्चे घर और केलु का प्रयोग करने पर बल दिया । जिससे वातावरण शुद्ध रहे। व्यक्ति स्वस्थ और निरोग रह कर जीवन यापन कर सकें।  वर्तमान जीवन में कोरोना और लम्बी जैसी महामारी को देखते हुए हमें भगवान देवनारायण के जीवन से बहुत सी अनुकरणीय शिक्षाएं ग्रहण करनी चाहिए। प्रकृति प्रेम भगवान देवनारायण वृक्षों की पूजा करते थे जाल,नीम,इत्यादि वृक्षों की रक्षा की। यह वृक्ष पर्यावरण संरक्षण का कार्य करते हैं और वातावरण को शुद्ध बनाए रखने में मदद करते हैं ।

भगवान देवनारायण ने वनों की रक्षा की और उनके पूजा स्थल आज भी बन्नी के नाम से जाने जाते हैं जहां पर वृक्षों को काटना अपराध माना जाता है।

भगवान श्री देवनारायण की गाथा एवं देवधाम


"DEVNARAYAN KI GATHA AVAM DEVDHAM" https://rzp.io/l/x39svqS7u


 भगवान श्री देवनारायण की गाथा एवं देवधाम  पुस्तक ई बुक पीडीएफ फॉर्मेट में उपलब्ध है आप इस लिंक पर जाकर पुस्तक पढ़ सकते हैं।

बगड़ावत लोकगाथा : एक अध्ययन

 

"BAGDAWAT LOKGATHA : EK ADHYAYAN" https://rzp.io/l/RKEB4bIwu



 बगड़वत लोकगाथा एक अध्ययन पुस्तक ई बुक पीडीएफ फॉर्मेट में उपलब्ध है आप इस लिंक पर जाकर पुस्तक पढ़ सकते हैं।


देव जी की गोल

 देव जी की गोल




 भगवान देवनारायण के भक्त देवनारायण जी के नाम की गोल धारण करते हैं। गोल तांबे से बनी एक अंगूठी है। जो अनामिका अंगुली में धारण की जाती है। मेवाड़ में इसकी खास मान्यता है। यह मान सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतीक है। भक्त भगवान देवनारायण के नाम से तांबे के तार से 3 बार घूमाकर रिंग जैसी आकृति वाली एक अंगूठी धारण करते है। अधिकांशतः परिवार के सबसे बड़े व्यक्ति को गोल पहनाई जाती है। इसकी धार्मिक मान्यता है । गोल पहनने वाले व्यक्ति को अपने जीवन में कुछ प्रण लेने होते हैं और उनका पालन आजीवन करना पड़ता है ।

सभी समाज के लोग भगवान देवनारायण में आस्था रखते हैं और उनके नाम से गोल धारण करते हैं। गोल धारण करने की परंपरा सबसे पहले कहां से शुरू हुई ? किस प्रकार शुरू हुई? इसकी कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती है। लेकिन यह मान्यता है की भगवान देवनारायण ने ही अपने भक्तों के धर्म सुधार हेतु गोल पहनने की परंपरा शुरू की थी। भगवान देवनारायण आयुर्वेद और ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता थे । उन्होंने शारीरिक और मानसिक पीड़ा को समाप्त करने के लिए तांबे का प्रयोग करने पर बल दिया। ऐसी मान्यता है कि भगवान देवनारायण के भक्तों ने उनके नाम से गोल धारण की और उनके आशीर्वाद से जीवन को सफल बनाया। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।

गोल पहनना एक धार्मिक आयोजन है जो भगवान के देवरा या मंदिर पर किया जाता है। धार्मिक अनुष्ठान के बाद प्रातःकाल गोल धारण करने वाले व्यक्ति को भगवान देवनारायण के नाम से तांबे से बनी विशिष्ट अंगूठी पहनाई जाती है। इसके पहनने के बाद वह जीवन में अपनी बुरी आदत को त्यागने का प्रण लेता है और उसे आजीवन पूर्ण निष्ठा से निभाता है। गोल धारण करने वाला व्यक्ति मांस-मदिरा का सेवन नहीं करता है । ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति अपना प्रण तोड़ता है उसे आजीवन कष्ट झेलना पड़ता है। अतः उसे दृढ़ निश्चय करके भगवान के नाम से धारण गोल का मान रखते हुए आजीवन अपने वचनों का पालन निष्ठा पूर्वक करना होता है। जो व्यक्ति भगवान देवनारायण की गोल पहन लेता है उसका जीवन मान, सम्मान और प्रतिष्ठा की त्रिवेणी में बहता है । उस पर भगवान की विशेष कृपा दृष्टि रहती है । वह व्यक्ति समाज में लोकप्रिय होता है और अपने दम-खम से  विशिष्ट सम्मान प्राप्त करता है। 

भगवान देवनारायण ने तांबा धारण करने पर बल दिया उसके पीछे उनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण था। वैज्ञानिक रूप से तांबा सबसे शुद्ध धातु है जो सूर्य व मंगल ग्रह का प्रतीक माना जाता है। तांबा धातु में एंटीबैक्टीरियल व एंटीवायरल गुण होते हैं। यह दिमाग में नकारात्मक विचारों को निकालकर सकारात्मक विचारों का प्रवेश कराता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भी तांबा एक पवित्र धातु है इससे सेहत ठीक रहती है । यह हमें मान सम्मान और प्रतिष्ठा दिलाता है । यश की प्राप्ति होती है। वाणी को नियंत्रित रखता है। बुद्धि को नियंत्रित करता है। पेट दर्द, गले का दर्द ,जोड़ों का दर्द, एसिडिटी, पाचन क्रिया, ब्लड प्रेशर, ब्लड सरकुलेशन के साथ-साथ गुस्से पर नियंत्रण रखता है। हमारी इम्यूनिटी बढ़ाता है। यह हड्डियों को मजबूत बनाता है। जिस व्यक्ति के शरीर में जिंक की कमी है उसे पूरी करता है । एनीमिक लोगों के लिए यह वरदान है। हृदय से संबंधित रोगों को दूर करता है । नींद के विकारों को ठीक करता है। व्यक्तित्व सुधार के लिए तांबा एक सबसे श्रेष्ठ धातु है। त्वचा के संपर्क में आने से त्वचा चमक युक्त बनती है। यह इम्यूनिटी सिस्टम को बढ़ाता है । हिमोग्लोबिन बनाने वाले एंजाइम को बढ़ाता है। शरीर के पित्त व वात को भी नियंत्रित करता है। तांबा न केवल शारीरिक रूप से बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी व्यक्ति में बदलाव करता है। मानसिक रूप से मजबूत बनाता हैं ।

तांबा धारण करना अच्छा है । अतः देवनारायण के सभी भक्तों को गोल धारण करनी चाहिए और अपने जीवन की बुराइयों को दूर करने का प्रण लेना चाहिए। भगवान देवनारायण की शिक्षाओं का अपने जीवन में अपनाकर इंसानियत व मानवता का पालन करना चाहिए । नशे से दूर रहकर मानव जीवन को सफल बनाना चाहिए।



बगड़ावतों का शक्तिपीठ: जयमति मंदिर

 बगड़ावतों का शक्तिपीठ: जयमति मंदिर सवाईभोज आसींद 




 


 बगड़ावत गाथा के ऐतिहासिक स्थल सवाई भोज मंदिर के पास प्रेमसागर की पाल पर स्थित रानी जयमति का मंदिर। यह भीलवाड़ा जिले की आसींद तहसील मे खारी नदी किनारे स्थित है। जयमति नव दुर्गा का अवतार है। रानी जयमति और सवाईभोज के सात्विक प्रेम और सच्ची निष्ठा का प्रतीक यह प्रेम सागर है। इसी तालाब के किनारे रानी जयमति सवाई भोज के साथ सती हुई । हिलोरे लेता यह तालाब और तालाब किनारे स्थित मंदिर उनके सच्चे प्रेम की दास्तां प्रकट करता है। नवरात्रि में यहां विशेष पूजा अर्चना की जाती है । परंपरा अनुसार सवाई भोज मंदिर के महंत वर्ष में दोनों नवरात्र के दिनों में माता रानी के मंदिर समक्ष उपस्थित रहते हैं। वहीं रहकर नौ दिन तक माता रानी की आराधना करते हैं तथा अपना धाम नहीं छोड़ते हैं। यह स्थान बगड़ावतों का शक्तिपीठ तथा आस्था का प्रतीक है। यहा भक्ति, शक्ति और नीति की त्रिवेणी प्रवाहित है।

किसानों के मसीहा: विजय सिंह पथिक

  डाॅ.अरुणा गुर्जर  व्याख्याता, भीलवाड़ा यश वैभव सुख की चाह नहीं, परवाह नहीं, जीवन न रहें, यदि इच्छा है, तो यह है जग में स्वेच्छाचार दमन ना ...